#राजनीति
February 7, 2026
सुक्खू सरकार को राज्यपाल का इंकार: RDG पर विशेष सत्र की नहीं दी परमिशन
राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ल ने बजट सेशन का दिया सुझाव
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शिमला। हिमाचल प्रदेश में केंद्र सरकार द्वारा RDG समाप्त किए जाने के फैसले पर मचा राजनीतिक घमासान अब संवैधानिक टकराव की ओर बढ़ता दिख रहा है। राज्यपाल द्वारा विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने की अनुमति न दिए जाने के बाद लोकभवन और सुक्खू सरकार के बीच मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं।
दरअसल, कांग्रेस सरकार ने 17 फरवरी को एक दिवसीय विशेष सत्र बुलाने का निर्णय लिया था। इस सत्र का मकसद 16वें वित्त आयोग द्वारा RDG समाप्त किए जाने के फैसले पर विधानसभा में चर्चा करना और इसके बाद एक प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजना था। इसके लिए राज्य सरकार ने औपचारिक रूप से लोकभवन को प्रस्ताव भेजा था, लेकिन राज्यपाल ने इसे मंजूरी नहीं दी।
सूत्रों के अनुसार, राज्यपाल ने सरकार को यह कहते हुए विशेष सत्र की अनुमति देने से इनकार कर दिया कि यह समय बजट सत्र का है। ऐसे में सरकार चाहे तो उसी मंच पर RDG जैसे अहम मुद्दे पर चर्चा कर सकती है। अलग से विशेष सत्र बुलाने की आवश्यकता नहीं है। राज्यपाल के इस फैसले को सरकार के फैसले पर सीधी आपत्ति के तौर पर देखा जा रहा है।
हिमाचल प्रदेश के लिए RDG सिर्फ एक वित्तीय सहायता नहीं, बल्कि आर्थिक संतुलन बनाए रखने का मजबूत आधार रही है। यह ग्रांट वर्ष 1952 से राज्य को लगातार मिलती रही है। अब इसके समाप्त होने से राज्य को अगले पांच वर्षों में करीब 50 हजार करोड़ रुपए के नुकसान की आशंका जताई जा रही है।
राज्य सरकार का कहना है कि यह नुकसान सीधे तौर पर विकास कार्यों, सामाजिक योजनाओं और कर्मचारियों के वेतन-भत्तों पर असर डालेगा। पहले से ही कर्ज और सीमित संसाधनों से जूझ रहे हिमाचल की आर्थिक सेहत पर इसका गहरा प्रभाव पड़ेगा।
16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट 1 फरवरी को संसद में पेश की गई, जिसमें आरडीजी को आगे जारी न रखने की सिफारिश की गई है। सरकार का तर्क है कि यह फैसला पहाड़ी राज्यों की भौगोलिक और पर्यावरणीय परिस्थितियों को नजरअंदाज कर लिया गया है। इसी वजह से विधानसभा में सर्वसम्मति से चर्चा कर केंद्र को संदेश देना जरूरी था।
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू पहले ही साफ कर चुके हैं कि आरडीजी का मुद्दा हिमाचल के अस्तित्व से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि राज्य का 90 प्रतिशत क्षेत्र पहाड़ी है, 68 प्रतिशत भूमि वन क्षेत्र में आती है और लगभग 28 प्रतिशत फॉरेस्ट कवर है।
हिमाचल से पांच प्रमुख नदियां निकलती हैं, जो देश के बड़े हिस्से की प्यास बुझाती हैं। इसी कारण हिमाचल को ‘नॉर्दन इंडिया का वॉटर बाउल’ और ‘लंग्स ऑफ नॉर्दन इंडिया’ कहा जाता है। मुख्यमंत्री के मुताबिक, राज्य हर साल करीब 90 हजार करोड़ रुपए की पारिस्थितिकीय सेवाएं देश को देता है, लेकिन बदले में उसे आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।
राज्यपाल के फैसले के बाद यह साफ संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले दिनों में लोकभवन और राज्य सरकार के बीच तनाव और बढ़ सकता है। कांग्रेस सरकार इसे हिमाचल के हितों की अनदेखी मान रही है, जबकि संवैधानिक पद पर बैठे राज्यपाल का रुख प्रक्रिया और समय के आधार पर बताया जा रहा है।