#विविध
August 13, 2025
हिमाचल के लोगों ने मृत्यु के बाद भी बचाई कई जिंदगियां- अंगदान कर लोगों को दिया नया जीवन
350 लोगों ने किया नेत्रदान, 23 का हुआ लीवर ट्रांसप्लांट
शेयर करें:
शिमला। कुछ लोग कहते हैं, मौत सब कुछ खत्म कर देती है… लेकिन हिमाचल में ऐसे लोग भी हैं, जिन्होंने मौत के बाद भी जिंदगी बांटी हैं। हिमाचल प्रदेश में अंगदान की मुहिम ने कई घरों को खुशियों से भर दिया है। राज्य अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन IGMC शिमला के ताजा आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2021 से अब तक 373 अंग प्रत्यारोपण सफलतापूर्वक किए जा चुके हैं।
पिछले चार साल में सबसे बड़ी संख्या 350 नेत्रदान की है, जिनसे इतने ही लोगों ने फिर से दुनिया के रंग देखना शुरू किया। वहीं, 23 लोगों को लीवर ट्रांसप्लांट के जरिए जीवन का नया अध्याय मिला।
अब प्रदेश में हर वर्ग के लोग अंगदान के लिए आगे आ रहे हैं। दो मामलों में ब्रेन डेड मरीजों के सभी अंग दान कर कई रोगियों को नया जीवन मिला। यही नहीं, इन चार वर्षों में 4,600 लोगों ने मृत्यु के बाद अंगदान का संकल्प लिया है। इसके बावजूद, अब भी 50 मरीज ऐसे हैं जो अंग मिलने का इंतजार कर रहे हैं।
विशेषज्ञ बताते हैं कि एक व्यक्ति का देह दान 8 से 9 लोगों की जान बचा सकता है। प्रत्यारोपण के बाद मरीज को 15 दिन अस्पताल में भर्ती रखा जाता है, पहले महीने हर हफ्ते जांच होती है और फिर एक साल तक हर दो महीने पर चेकअप किया जाता है। अंगों का आवंटन पूरी तरह तय मानकों- रक्त समूह, लोकेशन, आयु अंतर और पंजीकरण क्रम- के आधार पर किया जाता है।
अंगदान दो तरीकों से होता है- जीवित दान और मृत्यु उपरांत दान। जीवित व्यक्ति एक गुर्दा या लीवर का हिस्सा दान कर सकता है, जिससे दाता को कोई गंभीर नुकसान नहीं होता। वहीं, ब्रेन डेड घोषित मरीज के हृदय, फेफड़े, यकृत, गुर्दे, आंत और अग्न्याशय जैसे अंग तथा कॉर्निया, हड्डियां और त्वचा जैसे ऊतक जरूरतमंदों को दिए जा सकते हैं।
कांगड़ा के स्वरूप चंद के दोनों गुर्दे 2023 में 80% खराब हो गए। 2024 में वे डायलिसिस पर निर्भर हो गए — हफ्ते में तीन बार, चार-चार घंटे मशीन से जुड़े रहना उनकी दिनचर्या बन गया था। इसी दौरान उनकी बहन अंजू ने आगे आकर एक गुर्दा दान करने का साहसिक फैसला लिया। जून 2025 में प्रत्यारोपण हुआ और आज स्वरूप फिर से सक्रिय और स्वस्थ जीवन जी रहे हैं।
रामपुर की संध्या पिछले साल एक आंख से पूरी तरह अंधी हो चुकी थीं। डॉक्टरों ने उनका पंजीकरण किया और नौ महीने बाद उन्हें नेत्रदान से प्राप्त कॉर्निया ट्रांसप्लांट के लिए बुलाया गया। हिमकेयर योजना के तहत निःशुल्क ऑपरेशन के बाद संध्या अब अपने परिवार और प्रकृति के रंगों को फिर से देख पा रही हैं।
IGMC शिमला के सर्जरी विभागाध्यक्ष डॉ. पुनीत के 14 वर्षीय बेटे को गंभीर हादसे के बाद ब्रेन डेड घोषित किया गया। गहरे शोक में डूबे इस पिता ने बेटे के सभी अंग दान करने का फैसला किया। कई मरीजों को उनकी वजह से नई सांसें मिलीं। डॉ. पुनीत कहते हैं- “दुख कभी खत्म नहीं होता, लेकिन यह जानकर सुकून है कि उसके अंग आज भी किसी के जीवन में धड़क रहे हैं।”
प्रदेश में अंगदान के प्रति जागरूकता जरूर बढ़ रही है, लेकिन जरूरतमंदों की लंबी सूची बताती है कि और अधिक लोगों को इस मुहिम से जुड़ना होगा। अगर कोई व्यक्ति अंगदान का संकल्प लेता है, तो उसका नाम SOTTO में पंजीकृत होता है और मृत्यु के बाद उसके अंग समय पर जरूरतमंदों तक पहुंचाए जाते हैं।