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April 5, 2026

हिमाचल : पिता की मौ*त से बेसहारा हुए बच्चे, घर में नहीं है अन्न का तिनका- मां ने रचाई दूसरी शादी

पिता ही कर रहा था बच्चों की परवरिश, मां चार साल से अलग

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कांगड़ा। पिता का साया बच्चों के लिए सिर्फ एक सहारा नहीं, बल्कि पूरी दुनिया होता है। जब यही सहारा अचानक छिन जाए, तो बचपन की मासूमियत भी जिम्मेदारियों और मजबूरियों के बोझ तले दब जाती है। दो मासूमों की जिंदगी भी ऐसे ही मोड़ पर आकर ठहर गई है। कांगड़ा जिले के ज्वालामुखी विधानसभा क्षेत्र में पिता की मौत के बाद दो बच्चे बेसहारा हो गए हैं।

संघर्ष में सिमटा बचपन

अलूहा पंचायत के गांव आघार से एक मार्मिक कहानी सामने आई है। वार्ड नंबर-1 में रहने वाले दो मासूम बच्चों की जिंदगी में एक के बाद एक ऐसी त्रासदियां आईं कि उनका बचपन संघर्षों के साये में सिमट कर रह गया।

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मां ने की दूसरी शादी

चार साल पहले ही उनकी मां उन्हें छोड़कर दूसरी शादी कर चली गई थी। उस समय से उनके पिता ही उनके लिए मां और बाप दोनों की भूमिका निभा रहे थे। दिहाड़ी मजदूरी कर जैसे-तैसे घर चलाने वाले इस पिता ने अपने बच्चों की पढ़ाई और परवरिश में कोई कमी नहीं आने दी।

पिता के जाने से टूटा आखिरी सहारा

दिनभर की कड़ी मेहनत के बाद जो थोड़ा बहुत कमाते, उसी से बच्चों का भविष्य संवारने का सपना देख रहे थे। मगर किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। अचानक हुई उनकी मौत ने बच्चों को पूरी तरह असहाय कर दिया।

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बिगड़ गए घर के हालात

पिता के निधन के बाद हालात इतने बिगड़ गए हैं कि अब घर में दो वक्त की रोटी का इंतजाम भी मुश्किल हो गया है। बच्चों की स्कूल फीस, किताबें और यूनिफॉर्म तक का खर्च उठाना संभव नहीं रहा।

पढ़ाई पर लगा विराम

नतीजतन उनकी पढ़ाई बीच में ही छूट गई है। हालांकि, उनके ताया और आस-पड़ोस के कुछ लोग समय-समय पर मदद कर रहे हैं। मगर यह मदद अस्थायी है और बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए पर्याप्त नहीं।

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सोशल मीडिया ने दिखाई इंसानियत

जब इन बच्चों की दर्दभरी कहानी सोशल मीडिया के जरिए लोगों तक पहुंची, तो कई समाजसेवी और स्थानीय लोग मदद के लिए आगे आए। किसी ने राशन दिया, तो किसी ने किताबें और कुछ आर्थिक सहायता भी पहुंचाई।

 

पिता के मौत के बाद नहीं बचा कोई सहारा

सरकार को करनी होगी मदद

समाजसेवी केडी राणा का कहना है कि व्यक्तिगत स्तर पर की जा रही मदद सराहनीय जरूर है, लेकिन इससे इन बच्चों का स्थायी भविष्य सुरक्षित नहीं हो सकता। इसके लिए सरकारी स्तर पर ठोस कदम उठाने की जरूरत है।

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विधायक ने दिलाया भरोसा

उधर, स्थानीय विधायक संजय रतन ने तुरंत संज्ञान लिया। उन्होंने SDM ज्वालामुखी को निर्देश दिए हैं कि बच्चों की पेंशन और अन्य जरूरी कागजी प्रक्रियाएं जल्द पूरी की जाएं। विधायक ने भरोसा दिलाया है कि बच्चों की पढ़ाई किसी भी हालत में प्रभावित नहीं होने दी जाएगी और उन्हें हर संभव सहायता उपलब्ध करवाई जाएगी।

'चिल्ड्रन ऑफ द स्टेट' योजना से उम्मीद

स्थानीय लोगों ने प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू से अपील की है कि इन बच्चों को ‘चिल्ड्रन ऑफ द स्टेट’ योजना के तहत शामिल किया जाए। इस योजना के अंतर्गत अनाथ बच्चों की 12वीं तक की शिक्षा, हॉस्टल सुविधा और उच्च शिक्षा का पूरा खर्च सरकार द्वारा वहन किया जाता है।

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एक उम्मीद की किरण

गांव के लोगों का मानना है कि अगर इन बच्चों को इस योजना का लाभ मिल जाता है, तो उनका जीवन फिर से पटरी पर लौट सकता है। वरना हालात ऐसे हैं कि उनका भविष्य अंधकार में खो सकता है।

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