#विविध
February 17, 2025
करीब आधे हिमाचल पर बाढ़, भूस्खलन-हिमस्खलन का खतरा, IIT रोपड़ की रिसर्च
3,000 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्र सबसे अधिक खतरे में
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शिमला। हिमाचल प्रदेश के तकरीबन आधे हिस्से पर बाढ़, भूस्खलन और हिमस्खलन का खतरा मंडरा रहा है। आईआईटी रोपड़ में एसोसिएट प्रोफेसर रीत कमल तिवारी की एक रिसर्च में यह सामने आया है। प्रोफेसर रीत ने अपने रिसर्च के लिए जमीनी आंकड़ों और जीआईएस नक्शों का उपयोग किया है। स्प्रिंगर नेचर लिंक नामक पत्रिका में प्रकाशित शोध पत्र में कहा गया है कि 5.9 डिग्री और 16.4 डिग्री के बीच औसत ढलान वाले क्षेत्र और 1,600 मीटर तक की ऊंचाई वाले क्षेत्र विशेष रूप से भूस्खलन और बाढ़ का खतरा है।
वहीं 16.8 डिग्री और 41.5 डिग्री के बीच ढलान वाले भारी ऊंचाई वाले क्षेत्रों में हिमस्खलन और भूस्खलन दोनों होने की अधिक आसार हैं। प्रोफेसर रीत की रिसर्च टीम ने हाल ही में हिमालयी राज्यों में कई तरह के प्राकृतिक खतरों का आकलन किया है। उन्होंने पूरे राज्य में खतरे का मानचित्रण भी किया है। इसका लक्ष्य अधिक खतरों वाले इलाकों की पहचान करना और आपदा के खतरों को कम करने की रणनीतियों में सहायता करना है।
उत्तराखंड, जम्मू और कश्मीर तथा पूर्वोत्तर राज्यों में कई तरह के प्राकृतिक खतरों की संवेदनशीलता का आंकलन करने के लिए अध्ययन किए जा रहे हैं। हिमाचल प्रदेश में आई प्राकृतिक आपदा और रोड नेटवर्क की मजबूती के लिए चलाए जा रहे फोरलेन प्रोजेक्ट्स को देखते हुए यह रिसर्च और इसके आंकड़े योजनाकारों के लिए खासे महत्व के हो जाते हैं।
शोध के मुताबिक खड़ी पहाड़ी ढलान और 3,000 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्र सबसे अधिक खतरे में हैं। जीआईएस-आधारित मानचित्रण का उपयोग करते हुए, अध्ययन ने जोखिम वाले क्षेत्रों को वर्गीकृत किया है। इसमें दिखाया गया कि बाढ़ और भूस्खलन संभावित क्षेत्र आमतौर पर निचली-ऊंचाई वाली नदी घाटियों में होते हैं, जबकि बहुत ज्यादा ऊंचाई वाले पहाड़ों में हिमस्खलन का अधिक खतरा होता है।
अध्ययन में इस बात पर भी प्रकाश डाला गया कि किस प्रकार एक खतरा, आंतरिक कारणों के कारण, दूसरे को भी जन्म दे सकता है तथा इस बात पर बल दिया गया कि आपदा नियोजन और खतरे के प्रबंधन में सुधार के लिए यह जानकारी होना अत्यंत महत्वपूर्ण है।