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September 2, 2026

शिरगुल महाराज के सुप्रसिद्ध कारीगर ‘कृपालु’ नहीं रहे, 98 वर्ष की उम्र में निधन

98 साल की उम्र तक चलते-फिरते रहे कृपालु

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himachal Sirmaur News

सिरमौर। हिमचल प्रदेश के जिला सिरमौर के गिरिपार क्षेत्र से दुखद खबर सामने आई है। शिरगुल महाराज से जुड़ी पारंपरिक कारीगरी को अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा देने वाले कृपाल सिंह का 98 साल की उम्र में निधन हो गया। उनके जाने से इलाके ने एक ऐसे कारीगर को खो दिया, जो अपनी कला के साथ-साथ पुरानी संस्कृति और परंपराओं को भी संजोए हुए था।

98 साल की उम्र तक चलते-फिरते रहे कृपालु

स्थानीय लोगों के अनुसार, कृपालु उम्र के आखिरी पड़ाव तक काफी सक्रिय रहे। 98 साल की उम्र में भी वे पैदल आना-जाना करते थे। उनका जीवन बेहद सादगी भरा रहा और उन्होंने मेहनत को हमेशा अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाए रखा। उम्र बढ़ने के बावजूद अपनी पारंपरिक कला और काम के प्रति उनका लगाव कम नहीं हुआ। यही वजह है कि गांव और आसपास के लोग उन्हें आज भी एक मेहनती और सरल स्वभाव के व्यक्ति के रूप में याद करते हैं।

 

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शिरगुल महाराज से जुड़ी थी उनकी कारीगरी

राजगढ़ क्षेत्र के जाने-माने व्यक्ति शेरजंग चौहान के अनुसार, कृपालु कोई सामान्य कारीगर नहीं थे। उन्हें शिरगुल महाराज से जुड़ी पारंपरिक कारीगरी के लिए विशेष पहचान मिली हुई थी। उनका परिवार लंबे समय से इस परंपरा से जुड़ा रहा है। बताया जाता है कि करीब 800 साल पहले जब शिरगुल देवता का पहला मंदिर बनाया गया था, तब उनके पूर्वजों का भी इस निर्माण कार्य से संबंध रहा था। यही पुरानी परंपरा आगे चलकर कृपालु तक पहुंची और उन्होंने भी इसे पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़ाया।

कई पीढ़ियों से चली आ रही थी यह परंपरा

कृपालु जिस कारीगर परिवार से जुड़े थे, उसकी जड़ें कई पीढ़ियां पुरानी मानी जाती हैं। बताया जाता है कि इस कारीगर परंपरा का संबंध शाहू नाम के एक पूर्वज से माना जाता है। स्थानीय स्तर पर इस परंपरा से जुड़े लोगों को श्वाईक समुदाय के नाम से जाना जाता है। इस समुदाय ने लंबे समय से अपनी पारंपरिक कला, कारीगरी और धार्मिक परंपराओं को संभालकर रखा है। कृपालु भी इसी विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थे।

 

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कला के साथ संस्कृति को भी संभालकर रखा

कृपालु की खास बात यह थी कि उन्होंने अपनी कारीगरी को केवल रोजी-रोटी का साधन नहीं माना, बल्कि इसे अपनी संस्कृति और पहचान से जोड़कर रखा। उनके हाथों से तैयार की गई कारीगरी में पुराने समय की परंपरा और स्थानीय संस्कृति की झलक देखने को मिलती थी। उन्होंने अपने काम के जरिए आने वाली पीढ़ियों को भी अपनी जड़ों से जुड़े रहने का संदेश दिया।

उनके जाने से खत्म हुआ एक खास अध्याय

कृपालु का निधन केवल एक 98 वर्षीय बुजुर्ग के जाने की खबर नहीं है, बल्कि यह लोक कला और सदियों पुरानी शिल्प परंपरा से जुड़े एक महत्वपूर्ण अध्याय का खत्म होना भी है। उनके जैसे कारीगर किसी इलाके की पहचान और संस्कृति को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। उनके जाने से निश्चित तौर पर इस परंपरा को बड़ा नुकसान हुआ है।

 

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आने वाली पीढ़ियां भी याद रखेंगी उनका योगदान

कृपालु आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी कला, उनकी मेहनत और उनके द्वारा आगे बढ़ाई गई परंपरा आने वाले समय में भी लोगों को उनकी याद दिलाती रहेगी। उनकी कारीगरी और सांस्कृतिक योगदान आने वाली पीढ़ियों को अपनी पुरानी परंपराओं और जड़ों से जोड़ने का काम करता रहेगा। यही उनकी सबसे बड़ी विरासत मानी जाएगी।

परिवार और क्षेत्र में शोक का माहौल

कृपालु के निधन से उनके परिवार, रिश्तेदारों और उन्हें जानने वाले लोगों में शोक है। स्थानीय लोग उनके सरल स्वभाव, मेहनत और कला के प्रति समर्पण को याद कर रहे हैं। उनके जाने से गिरिपार क्षेत्र ने अपनी संस्कृति से जुड़े एक ऐसे व्यक्ति को खो दिया है, जिसकी कमी लंबे समय तक महसूस की जाएगी। ईश्वर दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें और शोक संतप्त परिवार को इस दुख की घड़ी में इसे सहने की शक्ति प्रदान करें।

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