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February 4, 2026
हिमाचल पंचायत चुनाव पर फिर घमासान : हाईकोर्ट के फैसले से CM नाखुश, दिल्ली पहुंचा मामला
राज्य में लागू डिजास्टर एक्ट को प्रमुख आधार बनाया है
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शिमला। हिमाचल प्रदेश में लंबे समय से अटके पंचायती राज चुनाव अब कानूनी तौर पर एक नए मोड़ पर पहुंच गए हैं। हिमाचल हाईकोर्ट के फैसले से नाराज CM सुक्खू ने अब पंचायत चुनाव को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
इस मामले को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में स्पेशल लीव पिटीशन (SLP) दायर कर दी है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें राज्य में 30 अप्रैल तक पंचायत चुनाव संपन्न कराने के निर्देश दिए गए थे।
हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दिए जाने के बाद अब इस पूरे मामले पर अंतिम सुनवाई देश की सर्वोच्च अदालत में होगी, जिससे प्रदेश की पंचायतों का भविष्य और चुनावों की समयसीमा तय होगी।
हिमाचल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई SLP में राज्य में लागू डिजास्टर एक्ट को प्रमुख आधार बनाया है। सरकार का तर्क है कि प्रदेश ने बीते समय में भारी बरसाती आपदाओं का सामना किया है, जिसके चलते राज्य में अब भी आपदा से जुड़ी परिस्थितियां पूरी तरह सामान्य नहीं हुई हैं।
सरकार ने दलील दी है कि आपदा प्रबंधन अधिनियम संसद द्वारा बनाया गया कानून है और पंचायती राज से जुड़े प्रावधान राज्य के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। ऐसे में पंचायती राज चुनावों को डिजास्टर एक्ट के ऊपर नहीं रखा जा सकता। सरकार का कहना है कि मौजूदा हालात में पंचायत चुनाव कराना व्यावहारिक नहीं है और इससे प्रशासनिक एवं राहत कार्य प्रभावित हो सकते हैं।
गौरतलब है कि हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति रोमेश वर्मा शामिल थे, ने राज्य सरकार और राज्य चुनाव आयोग को 30 अप्रैल से पहले पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव पूर्ण करने के स्पष्ट आदेश दिए थे। हाईकोर्ट ने यह भी निर्देश दिया था कि चुनाव से जुड़ी सभी प्रारंभिक प्रक्रियाएं 28 फरवरी तक पूरी की जाएं, ताकि निर्धारित समयसीमा में लोकतांत्रिक प्रक्रिया बाधित न हो।
यह मामला डिक्कन कुमार ठाकुर और अन्य याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया था। 9 जनवरी को इस याचिका पर फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट की खंडपीठ ने कहा था कि राज्य सरकार केवल डिजास्टर एक्ट का हवाला देकर पंचायत चुनावों को अनिश्चितकाल तक टाल नहीं सकती।
अदालत ने अपने आदेश में इस बात पर भी जोर दिया था कि पंचायतें लोकतंत्र की सबसे निचली और महत्वपूर्ण इकाई हैं और लंबे समय तक निर्वाचित प्रतिनिधियों के बिना इन संस्थाओं का संचालन संवैधानिक भावना के उलट है।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में राज्य सरकार और राज्य चुनाव आयोग दोनों को चुनाव संपन्न कराने की जिम्मेदारी सौंपी थी। अदालत का मानना था कि प्रशासनिक चुनौतियों के बावजूद चुनाव प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए वैकल्पिक व्यवस्थाएं की जा सकती हैं।
राज्य सरकार द्वारा SLP दायर किए जाने के बाद अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन हो गया है। सर्वोच्च अदालत में होने वाली सुनवाई से यह स्पष्ट होगा कि हिमाचल प्रदेश में पंचायत चुनाव तय समय पर होंगे या सरकार को राहत मिलेगी।
इस फैसले का सीधा असर प्रदेश की हजारों पंचायतों, पंचायत प्रतिनिधियों और ग्रामीण प्रशासनिक व्यवस्था पर पड़ेगा। राजनीतिक दृष्टि से भी यह मामला बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि इससे राज्य में स्थानीय निकायों के भविष्य की दिशा तय होगी।