#विविध
September 30, 2026
हिमाचल : पत्नी को गौशाला में रखा, टॉयलेट तक इस्तेमाल नहीं करने दिया; कोर्ट बोला- ये कैसी शादी?
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा
शेयर करें:

शिमला। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पत्नी को घर की बुनियादी सुविधाओं से वंचित करना उसके सम्मान और गरिमा को प्रभावित करता है।
अदालत ने पत्नी को शौचालय और वॉशरूम जैसी मूलभूत सुविधाओं का इस्तेमाल न करने देने की परिस्थिति को गंभीर माना। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने पति की तलाक की अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने मंडी फैमिली कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा- जिसमें तलाक की अर्जी पहले ही खारिज की जा चुकी थी।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति अजय मोहन गोयल और न्यायमूर्ति योगेश जसवाल की खंडपीठ ने की। पति पेशे से फिजिकल एजुकेशन टीचर है। उसने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(i-a) और 13(1)(i-b) के तहत पत्नी पर क्रूरता और परित्याग का आरोप लगाकर तलाक मांगा था।
पति का दावा था कि-
इस मामले में मंडी फैमिली कोर्ट ने 8 अगस्त 2019 को पति की तलाक याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद पति ने हाईकोर्ट में अपील दायर की। हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पति के आरोपों के साथ-साथ पत्नी के अलग रहने की परिस्थितियों और रिकॉर्ड में मौजूद साक्ष्यों की भी जांच की।
सुनवाई के दौरान सामने आया कि-
अदालत ने इस तथ्य को महत्वपूर्ण माना। कोर्ट के अनुसार, किसी व्यक्ति को शौचालय जैसी बुनियादी मानवीय सुविधा से वंचित करना उसके सम्मान और गरिमा को प्रभावित करता है।रिकॉर्ड में यह भी सामने आया कि रहने की परिस्थितियों को लेकर विवाद पहले पुलिस तक पहुंच चुका था।
वर्ष 2012 और 2014 के समझौता दस्तावेज रिकॉर्ड में थे- जिन पर पति के हस्ताक्षर बताए गए। इनमें पत्नी के साथ उचित व्यवहार करने तथा उसे शौचालय और वॉशरूम इस्तेमाल करने देने से संबंधित बातें सामने आई थीं।
मामले में पत्नी ने घरेलू हिंसा कानून के तहत भी राहत मांगी थी। उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड के अनुसार, इन कार्यवाहियों में पत्नी को राहत मिली थी और पति को घरेलू हिंसा करने तथा पत्नी को घर से बेदखल करने से रोकने संबंधी आदेश भी पारित हुए थे।
हाईकोर्ट ने कहा कि लंबे समय तक अलग रहना अपने आप में परित्याग साबित नहीं करता। यह देखना भी जरूरी है कि पत्नी किन परिस्थितियों में अलग रह रही थी। अदालत ने माना कि उपलब्ध साक्ष्यों से पत्नी का अलग रहना पूरी तरह उसकी स्वेच्छा का परिणाम नहीं माना जा सकता। अगर पति के व्यवहार के कारण पत्नी अलग रहने की स्थिति में पहुंची- तो बाद में उसी अलगाव को उसके खिलाफ परित्याग के आधार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
अदालत ने यह भी पाया कि पति की ओर से लगाए गए क्रूरता के कई आरोप सामान्य प्रकृति के थे और उन्हें पर्याप्त ठोस साक्ष्यों से साबित नहीं किया गया। ऐसे में पति तलाक के लिए आवश्यक वैधानिक आधार स्थापित करने में सफल नहीं रहा। सभी तथ्यों और रिकॉर्ड पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने पति की अपील खारिज कर दी और मंडी फैमिली कोर्ट के 8 अगस्त, 2019 के फैसले को बरकरार रखा।