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September 30, 2026
HP : अपने बेटे का जन्मतिथि तक नहीं जानता था शख्स, पत्नी पर लगाए आरोप- कोर्ट ने बुरी तरह लताड़ा
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का फैसला रखा बरकरार
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शिमला। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि पत्नी अगर अपने कानूनी अधिकारों के लिए भरण-पोषण या घरेलू हिंसा से संबंधित न्यायिक प्रक्रिया का सहारा लेती है- तो महज इस आधार पर इसे पति के प्रति मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता।
अदालत ने कहा कि किसी पक्ष के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू करना अपने आप में क्रूरता साबित नहीं करता- बल्कि इसके लिए मामले के वास्तविक तथ्यों और साक्ष्यों को देखना जरूरी है।
न्यायमूर्ति अजय मोहन गोयल और न्यायमूर्ति योगेश जसवाल की खंडपीठ ने पति की उस अपील को खारिज कर दिया। जिसमें उसने मंडी फैमिली कोर्ट के तलाक की याचिका खारिज करने के फैसले को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने निचली अदालत के निर्णय को बरकरार रखा।
मामले के अनुसार दंपत्ति का विवाह 19 अप्रैल 2015 को हिंदू रीति-रिवाजों के तहत हुआ था। दोनों का एक बेटा है। शादी के समय पत्नी चंडीगढ़ में जीएनएम नर्सिंग प्रशिक्षण ले रही थी।
पति ने आरोप लगाया था कि ट्रेनिंग पूरी होने के बाद पत्नी ज्यादातर समय मायके में रहने लगी और दोनों के बीच अक्सर विवाद होता था। पति ने पत्नी के व्यवहार को मानसिक क्रूरता बताते हुए कोर्ट से तलाक की मांग की थी।
वहीं, पत्नी ने इन आरोपों से इनकार किया। उसका कहना था कि उसे पति की ओर से शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा, जिसके चलते उसे मायके में रहने के लिए मजबूर होना पड़ा।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत के सामने घरेलू हिंसा से जुड़ी पूर्व कार्यवाही का रिकॉर्ड भी रखा गया। रिकॉर्ड के मुताबिक घुमारवीं की अदालत ने पत्नी के पक्ष में आदेश देते हुए उसे प्रतिमाह 2,000 रुपये भरण-पोषण और 5,000 रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया था। इसके अलावा उसके रहने के लिए एक कमरे की व्यवस्था करने का आदेश भी दिया गया था।
हाईकोर्ट ने इस न्यायिक आदेश को महत्वपूर्ण माना। अदालत के सामने जब पत्नी को घरेलू हिंसा से पीड़ित मानकर पहले ही राहत दिए जाने का तथ्य मौजूद था- तो पति की ओर से इन मामलों को महज झूठा बताकर मानसिक क्रूरता का आधार बनाने की दलील को स्वीकार नहीं किया गया।
हाईकोर्ट ने तलाक के लिए मानसिक क्रूरता के आधार पर लगाए जाने वाले आरोपों पर भी टिप्पणी की। अदालत ने हिंदू मैरिज एंड डिवोर्स (हिमाचल प्रदेश) रूल्स, 1982 का हवाला देते हुए कहा कि क्रूरता का दावा करने वाले पक्ष को संबंधित घटनाओं का पर्याप्त और स्पष्ट विवरण देना चाहिए। सिर्फ यह कहना कि पत्नी का व्यवहार असहनीय था, वह अक्सर झगड़ा करती थी या उसके साथ रहना मुश्किल था, पर्याप्त नहीं है। कथित घटनाओं के बारे में तारीख, समय, स्थान और परिस्थितियों जैसी जरूरी जानकारी याचिका में स्पष्ट होनी चाहिए।
सुनवाई के दौरान जिरह में पति से उसके बेटे के बारे में भी सवाल किए गए। अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार पति अपने ही बेटे की जन्मतिथि नहीं बता सका। खंडपीठ ने इस तथ्य को भी मामले की परिस्थितियों में महत्वपूर्ण माना और इसे बच्चे के प्रति पिता की उदासीनता के संदर्भ में देखा।
अदालत ने यह भी गौर किया कि पत्नी के अलग रहने के बाद पति ने उसे वापस लाने के लिए पंचायत, गांव के बुजुर्गों या किसी अन्य सम्मानित व्यक्ति की मदद लेने का प्रयास नहीं किया। इसके अलावा दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना के लिए भी उसने कोई कानूनी कार्यवाही नहीं की थी।
हाईकोर्ट ने पूरे रिकॉर्ड और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद पति की अपील खारिज कर दी। इसके साथ ही मंडी फैमिली कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा गया, जिसमें तलाक की याचिका अस्वीकार की गई थी।