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March 17, 2026
हिमाचल हाईकोर्ट ने सुक्खू सरकार को लगाई फटकार, टालमटोल करने पर लगाया भारी जुर्माना
आउटसोर्स कर्मियों से जुड़े मामले की सुनवाई पर सख्त हुआ हिमाचल हाईकोर्ट
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शिमला। हिमाचल प्रदेश में प्रशासनिक कार्यप्रणाली को लेकर हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए सुखविंदर सिंह सुक्खू की सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। आउटसोर्स कर्मियों से जुड़े मामले में बार.बार सुनवाई टालने और आवश्यक जानकारी प्रस्तुत न करने पर अदालत ने हिमाचल की सुक्खू सरकार पर 20 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है। कोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया कि आदेशों की अनदेखी और टालमटोल बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने पाया कि पहले दिए गए निर्देशों के बावजूद सरकार ने शपथपत्र दाखिल नहीं किया। सरकार की ओर से बार-बार अतिरिक्त समय मांगकर मामले को लंबित रखने की कोशिश की गई] जिस पर अदालत ने कड़ी आपत्ति जताई। कोर्ट ने इसे गंभीर लापरवाही मानते हुए जुर्माने की राशि आईजीएमसी अस्पताल के निर्धन रोगी उपचार कोष में जमा कराने के निर्देश दिए।
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सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने आउटसोर्स व्यवस्था पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह की भर्तियां न केवल कर्मचारियों का शोषण करती हैं] बल्कि यह समानता के अधिकार का भी उल्लंघन है। अदालत ने साफ किया कि नियमित पदों को आउटसोर्स के माध्यम से भरना नियमों के खिलाफ है और यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 की भावना के विपरीत है। साथ ही स्वास्थ्य सेवाओं में आउटसोर्स कर्मियों की नियुक्ति को अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार से भी जोड़ा गया।
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हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह विभागवार सभी आउटसोर्स कर्मियों का पूरा ब्योरा, उनकी नियुक्ति तिथि और वर्तमान स्थिति के साथ प्रस्तुत करे। इसके अलावा यह भी स्पष्ट करने को कहा गया है कि क्या किसी कर्मचारी को नियमित किया गया है और क्या इस संबंध में कोई नीति लागू है। अदालत ने चेतावनी दी है कि यदि अगली सुनवाई तक जानकारी पेश नहीं की गई तो उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर ही मामले का फैसला कर दिया जाएगा।
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कोर्ट ने विशेष रूप से अस्पतालों में आउटसोर्स स्टाफ नर्सों की नियुक्ति पर चिंता जताई। अदालत ने कहा कि इन कर्मियों पर विभाग का सीधा नियंत्रण नहीं होता, जिससे मरीजों की देखभाल और सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। ऐसे कर्मचारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करना भी जटिल होता है, जो स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर असर डाल सकता है।
इसी दौरान हाईकोर्ट ने एक अन्य मामले में सीनियर रेजिडेंट डॉक्टरों की काउंसलिंग प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगा दी। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने काउंसलिंग में भाग लेने के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र की शर्त को प्रथम दृष्टया अनुचित माना।
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वहीं, न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की एकल पीठ ने तृतीय और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के पक्ष में अहम फैसला सुनाया। अदालत ने एक कर्मचारी से की जा रही 41 हजार रुपये की वसूली को रद्द करते हुए पहले से काटी गई राशि लौटाने के आदेश दिए। कोर्ट ने कहा कि यदि अधिक भुगतान में कर्मचारी की कोई गलती नहीं है, तो उससे वसूली करना कानूनन गलत है।