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March 20, 2026
हिमाचल के सरकारी कर्मियों को बड़ा झटका, लंबे समय तक नहीं मिलेगी गृह जिला में तैनाती
गृह जिला में एक बार नियुक्ति के बाद 100 से 150 किमी दूर मिलेगी दूसरी तैनाती
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शिमला। हिमाचल प्रदेश के सरकारी कर्मचारियों को बड़ा झटका लगने वाला है। लंबे समय से अपने ही गृह जिला में नौकरी कर रहे सरकारी कर्मचारियों को अब घर से 100 से 150 किलोमीटर दूर जाना पड़ सकता है। यह खबर उन कर्मचारियों के लिए बड़ा झटका मानी जा रही है, जो अपनी ऊंची पहुंच के दम पर सालों से एक ही जगह और अपने घर के आसपास ही नौकरी कर रहे थे। हिमाचल हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार को नई स्थानांतरण नीति में इसका प्रावधान करने के निर्देश दिए हैं।
हिमाचल हाईकोर्ट के ताजा निर्देशों ने प्रदेश के सरकारी कर्मचारियों, खासकर राज्य स्तरीय कर्मियों के लिए मुश्किलें बढ़ा दी हैं। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि अब वर्षों तक अपने घर या गृह जिला के आसपास नौकरी करने का चलन खत्म होगा। यह फैसला उन कर्मचारियों के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है, जो लंबे समय से एक ही स्थान पर जमे हुए हैं।
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अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं कि नई स्थानांतरण नीति में ऐसे प्रावधान जोड़े जाएं, जिनके तहत किसी भी कर्मचारी को प्रारंभिक नियुक्ति के बाद कम से कम दो या तीन लगातार तैनातियों तक उसके गृह जिला में नियुक्ति न दी जाए। इसके साथ ही यदि कोई कर्मचारी पहले ही अपने गृह जिला में सेवा दे चुका है, तो उसे उसी जिले में दोबारा कहीं और तैनात न किया जाए। इसका मतलब साफ है कि अब कर्मचारियों को घर से दूर जाकर सेवाएं देनी होंगी।
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न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि एक स्थान से दूसरे स्थान पर तैनाती के बीच न्यूनतम दूरी 100 से 150 किलोमीटर होनी चाहिए। अदालत का मानना है कि इससे पक्षपात और भेदभाव की संभावना खत्म होगी और सभी कर्मचारियों के साथ समान व्यवहार सुनिश्चित किया जा सकेगा। न्यायमूर्ति अजय मोहन गोयल ने सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली सरकार को निर्देश दिए हैं कि स्थानांतरण प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बनाया जाए। मुख्य सचिव को इन निर्देशों पर जवाब देने के आदेश दिए गए हैं और मामले की अगली सुनवाई 16 अप्रैल 2026 को निर्धारित की गई है।
अदालत ने यह भी कहा है कि सभी कर्मचारियों की तैनाती और सेवा अवधि की जानकारी सार्वजनिक की जाए। इसके लिए एक ऐसी व्यवस्था बनाई जाए, जिसमें यह साफ दिखाई दे कि किस कर्मचारी ने किस स्थान पर कितने समय तक सेवा की है। यदि कोई कर्मचारी तय अवधि पूरी कर लेता है, तो उसके नाम के साथ विशेष संकेत दिखाया जाए ताकि यह स्पष्ट हो सके कि उसकी तैनाती अवधि पूरी हो चुकी है।
न्यायालय ने सुझाव दिया है कि तृतीय और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के लिए एक स्थान पर सेवा अवधि तीन वर्ष और अन्य कर्मचारियों के लिए दो वर्ष निर्धारित की जा सकती है। इसके अलावा विभिन्न स्थानों पर खाली पदों की जानकारी भी सार्वजनिक की जाए, ताकि स्थानांतरण पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी ढंग से हो सके। अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि तबादला प्रक्रिया को लेकर यह धारणा बन गई है कि यह एक तरह का कारोबार बन चुका है। इस स्थिति को खत्म करने के लिए पारदर्शिता और स्पष्ट नियम जरूरी हैं।
मामले में एक कर्मचारी जो वर्ष 2019 से मंडी में कार्यरत था, ने अपने स्थानांतरण को चुनौती दी थी। अदालत ने उसकी याचिका खारिज करते हुए कहा कि कोई भी कर्मचारी अपनी पसंद की जगह पर स्थायी रूप से तैनात रहने का अधिकार नहीं रखता। अदालत ने यह भी कहा कि कर्मचारियों की यह प्रवृत्ति विभागीय कार्यों में बाधा पैदा करती है।
इसी बीच हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट में शिक्षकों से जुड़े एक अन्य मामले की सुनवाई भी जारी है। खंडपीठ, जिसमें विवेक सिंह ठाकुर और रंजन शर्मा शामिल हैं, उस नियम पर विचार कर रही है जिसमें सरकारी स्कूलों में पढ़ाने के लिए शिक्षकों को परीक्षा पास करना अनिवार्य किया गया है।
शिक्षकों का कहना है कि पहले से कार्यरत शिक्षकों के लिए परीक्षा अनिवार्य करना अनुचित है और इससे उनकी सेवा शर्तों पर असर पड़ता है। हालांकिए अभी तक अदालत की ओर से कोई राहत नहीं दी गई है और मामले की सुनवाई जारी है।