#विविध
April 4, 2025
अमेरिकी टैरिफ वॉर से हिमाचल के गद्दी समुदाय पर पड़ी मार, अब क्या कमाएंगे और कैसे जिएंगे ?
केंद्र और राज्य सरकार से मांगी सब्सिडी
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कांगड़ा। अमेरिकी में ट्रंप प्रशासन द्वारा भारत से होने वाले आयात पर 26% का शुल्क लगाए जाने का असर हिमाचल के गरीब गद्दी चरवाहों पर भी पड़ा है। ये चरवाहे हर साल 2.5 लाख किलो जैविक ऊन अमेरिका को बेचते हैं। लेकिन टैरिफ वॉर के कारण अब इनका ऊन ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, पेरू और तुर्की जैसे देशों के मुकाबले महंगा हो जाएगा। बैजनाथ और बीर-बिलिंग की किसान यूनियन ने केंद्र और राज्य सरकार से सब्सिडी मांगी है, ताकि वे अपना गुजारा चला सकें।
हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा और चंबा में भेड़ चराने वाले यह गद्दी चरवाहे हिमाचल प्रदेश वूल फेडरेशन को पहले 45 रुपए किलो में ऊन बेचते थे। बाद में उन्होंने अपने ऊन का जैविक प्रमाणपत्र हासिल किया और अमेरिकी कंपनियों को 60 से 70 रुपए प्रति किलो की दर पर ऊन बेचने लगे। गद्दी चरवाहों से ऊन खरीदने वाली अमेरिकी कंपनियां ही सारा कच्चा माल अपने खर्च पर दिल्ली ले जाती हैं और वहां से ऊन अमेरिका भेजा जाता है।
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हिमाचल प्रदेश में 2023 की स्थिति में भेड़ पालक गद्दी किसानों की संख्या 5050 है। वहीं भेड़ों की संख्या भी बढ़कर साढ़े 8 लाख को पार कर चुकी है। इन भेड़ों से सालाना 170 टन ऊन पैदा होता है।
अब अमेरिकी सरकार के भारत पर जवाबी टैक्स ने गद्दी चरवाहों के ऊन को महंगा कर दिया है। अमेरिका ने ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, पेरू और तुर्की के ऊन पर 10 फीसदी टैक्स लगाया है। इस तरह से हिमाचली गद्दी चरवाहों का ऊन 16 प्रतिशत महंगा हो गया है। अब बैजनाथ और बड़ा भंगाल के गद्दी किसान केंद्र और राज्य सरकार के सामने इस मुद्दे को उठाने जा रहे हैं। किसान यूनियन का यह भी कहना है कि ऊन उत्पादन केवल उनके जीने का सहारा ही नहीं, बल्कि इससे उन्हें अतिरिक्त आय भी होती है, जिससे वे सालभर अपना गुजारा कर सकते हैं।

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गद्दी चरवाहों की इस आय को देखकर ही कांगड़ा और चंबा के कुछ और ऊन उत्पादक किसान जैविक ऊन के उत्पादन में सामने आने लगे हैं। गद्दी किसानों के यूनियन का कहना है कि अमेरिका के 26 फीसदी जवाबी टैक्स के चलते वे होने वाले घाटे की वे भरपाई नहीं कर सकते। इसकी भरपाई केंद्र और राज्य सरकार की सब्सिडी ही कर पाएगी।
| वर्ष | कुल गद्दी किसान | भेड़पालकों की संख्या | कुल भेड़ें | ऊन उत्पादन (टन) |
|------|---------------|-----------------|-----------|---------------|
| 2018 | 5,000 | 4,800 | 8,00,000 | 1,500 |
| 2019 | 5,100 | 4,850 | 8,10,000 | 1,550 |
| 2020 | 5,200 | 4,900 | 8,20,000 | 1,600 |
| 2021 | 5,250 | 4,950 | 8,30,000 | 1,650 |
| 2022 | 5,300 | 5,000 | 8,40,000 | 1,700 |
| 2023 | 5,350 | 5,050 | 8,50,000 | 1,750 |