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August 16, 2025
हिमाचल के इस मेले में जमकर उछाला जाता है एक-दूसरे पर कीचड़, वजह जान हैरान हो जाएंगे आप
सराज घाटी का अनोखा मेला : कीचड़ में खेलती आस्था
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मंडी। देवभूमि हिमाचल प्रदेश की धरती पर मेलों और उत्सवों की एक अनूठी परंपरा रही है। जहां एक ओर मेले देवी-देवताओं की शोभायात्रा, झूले और दुकानों के लिए प्रसिद्ध होते हैं, वहीं मंडी ज़िले की सराज घाटी में एक ऐसा मेला मनाया जाता है। जिसकी सबसे बड़ी पहचान है, एक-दूसरे पर कीचड़ फेंकना।
जानकारी के अनुसार, यह अनूठा आयोजन हर साल श्रावण मास की पूर्णिमा से शुरू होता है और पूरे पांच दिन तक चलता है। इसे देव विष्णु मतलौड़ा, देव सुमुनाग और देव नलबाणी का मेला माना जाता है। इस दौरान क्षेत्र भर के लोग एकत्र होकर देव परंपराओं का निर्वहन करते हैं, गीत-नृत्य में भाग लेते हैं और अपनी आस्था का अद्भुत प्रदर्शन करते हैं।
मेले की शुरुआत देवताओं की पारंपरिक पूजा-अर्चना और लोकगीतों-नाटियों के साथ होती है। पांचवें दिन इस मेले का सबसे रोचक और रहस्यमय पड़ाव आता है, जंगल से एक विशाल वृक्ष को काटकर मेला स्थल तक लाना।
इस परंपरा में पूरे गांव के लोग मिलकर उस पेड़ को उठाते हैं और उसे मैदान तक ले आते हैं। खास बात यह है कि इस दौरान लोग एक-दूसरे को गालियां देते हैं और अशोभनीय तंज कसते हैं। माना जाता है कि ऐसा करने से नकारात्मक ऊर्जाएं और बुरी शक्तियां दूर भाग जाती हैं। जब यह वृक्ष मेला स्थल पर पहुंच जाता है, तो असली रंगारंग दृश्य की शुरुआत होती है।
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बरसात के मौसम में मैदान पहले से ही कीचड़ से भरा रहता है। लोग एक-दूसरे को पकड़कर कीचड़ में लोटाते हैं, जमकर कीचड़ फेंकते हैं और फिर इसी कीचड़ में हिमाचल की प्रसिद्ध नाटी डाली जाती है। यह दृश्य न केवल हास्य और उल्लास से भरा होता है, बल्कि लोगों की गहरी आस्था और सामूहिक एकता का प्रतीक भी है।
देव सुमुनाग के गूर मोहर सिंह बताते हैं कि, यह मेला सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि सदियों से चली आ रही परंपराओं और देव आस्था का जीवंत उदाहरण है। यहां के लोग मानते हैं कि यह आयोजन उन्हें देवताओं की कृपा और सुरक्षा का आशीर्वाद दिलाता है।
मंडी ज़िले की सराज घाटी अपने ऐसे ही विचित्र और आस्था-प्रधान मेलों के लिए जानी जाती है। काहिका उत्सव भी इसी परंपरा का हिस्सा है, जिसमें अश्लील तंज कसने और प्रतीकात्मक मृत्यु के बाद पुनर्जीवन जैसी अनोखी रस्में निभाई जाती हैं।