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March 17, 2026

सुप्रीम कोर्ट से 'इच्छामृ.त्यु' पाने वाले हरीश राणा का हिमाचल से है नाता, गांव में पसरा सन्नाटा

रोजगार की तलाश में हरीश के पिता ने किया था दिल्ली का रूख

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Harish Rana

कांगड़ा। देशभर में चर्चा में रहे इच्छामृत्यु पाने वाले हरीश राणा का हिमाचल प्रदेश से गहरा संबंध है। सुप्रीम कोर्ट से इच्छामृत्यु की अनुमति पाने वाले हरीश राणा की जड़ें कांगड़ा जिला के जयसिंहपुर उपमंडल की सरी पंचायत के प्लेटा गांव से जुड़ी हैं। भले ही यह परिवार दशकों पहले रोजी-रोटी की तलाश में दिल्ली की ओर निकल गया था] लेकिन अपने पैतृक गांव से उनका भावनात्मक रिश्ता आज भी उतना ही मजबूत है। 11 मार्च को जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश को 'पैसिव यूथेनेशिया' (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) की अनुमति दी, तो प्लेटा गांव के हर घर में सन्नाटा पसर गया और हर आंख नम हो गई।

प्लेटा गांव में पसरा सन्नाटा

प्लेटा गांव में इन दिनों गहरा सन्नाटा पसरा हुआ है। स्थानीय लोग इस घटना को अपने ही परिवार का दुख मान रहे हैं। पंचायत सरी की निवर्तमान प्रधान रीमा कुमारी ने भी इस संबंध की पुष्टि करते हुए कहा कि यह केवल एक परिवार की नहीं, बल्कि पूरे इलाके की पीड़ा बन गई है। उन्होंने बताया कि हरीश राणा के पिता अशोक राणा रोजगार और अन्य कारणों से प्रदेश से बाहर जाकर बस गए। हालांकि परिवार के सदस्य समय.समय पर अपने पैतृक गांव आते.जाते रहे हैं। बताया जा रहा है कि अशोक राणा ने साल 1989 में दिल्ली का रुख किया था।

 

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एक हादसे ने बदल दी जिंदगी 

हरीश राणा वर्ष 2013 में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे, जब एक हादसे में वह चौथी मंजिल से गिर गए। इस दुर्घटना के बाद उन्हें गंभीर सिर की चोट लगी और वह कोमा में चले गए। पिछले 13 वर्षों से वह बेहोशी की हालत में जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहे थे। डॉक्टरों ने उनकी स्थिति को नाजुक बताते हुए ठीक होने की संभावना बेहद कम जताई थी।

 

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बेटे के लिए सब कुछ दांव पर लगाया

हरीश के पिता अशोक राणा और माता निर्मला देवी ने बेटे के इलाज के लिए हर संभव प्रयास किया। उन्होंने अपना घर तक बेच दिया, आर्थिक संकट झेला और हर महीने भारी खर्च उठाया, लेकिन उम्मीद नहीं छोड़ी। परिवार गाजियाबाद में रहते हुए भी हरीश की देखभाल एक छोटे बच्चे की तरह करता रहा। गांव के लोग बताते हैं कि माता-पिता ने जिस धैर्य और समर्पण के साथ बेटे की सेवा की, वह मिसाल है।

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सुप्रीम कोर्ट का फैसला: पीड़ा से मुक्ति की अनुमति

माता पिता ने अपने बेटे की जी जान से सेवा की, लेकिन अब बुढ़ापे की दहलीज पर कदम रखने के बाद उनकी बेटे के प्रति चिंता बढ़ गई, जिसके चलते इस दंपती ने बेटे के लिए देश की शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया। आखिरकार 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने इस संवेदनशील मामले में फैसला सुनाते हुए हरीश राणा को पैसिव इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी। अदालत ने माता-पिता की पीड़ा और चिकित्सा स्थिति को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया। इसके बाद हरीश को चिकित्सा संस्थान में जीवन रक्षक उपकरणों से हटाने की प्रक्रिया शुरू की गई] जिससे उन्हें लंबे समय से चल रही असहनीय स्थिति से मुक्ति मिल सके।

 

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हिमाचल से भावनात्मक जुड़ाव बना रहा

हालांकि हरीश राणा का परिवार वर्षों पहले बेहतर भविष्य की तलाश में दिल्ली चला गया था] लेकिन हिमाचल से उनका जुड़ाव कभी टूटा नहीं। कोरोना काल में भी परिवार हरीश को लेकर अपने पैतृक गांव आया था। गांव में बना उनका घर आज भी परिवार की यादों और उम्मीदों का प्रतीक है, जहां अब इस घटना के बाद शोक का माहौल है।

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