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April 2, 2026
पंचायत चुनाव से पहले सुक्खू सरकार ने बना दिया नया कानून; नशा तस्कर नहीं लड़ पाएंगे Election
डिफाल्टर.ऑडिट रिकवरी वाले भी अयोग्य नशा तस्करी में पकड़े गए तो जाएगी कुर्सी
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शिमला। हिमाचल प्रदेश में पंचायत चुनावों की सरगर्मियां तेज होते ही सियासी समीकरण बदलने लगे हैं। विधानसभा के बजट सत्र में सरकार ने एक ऐसा सख्त कानून पास कर दिया है, जिससे चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे कई लोगों के सपनों पर पानी फिर सकता है। नशा तस्करी में संलिप्त लोगों पर चुनावी रोक का यह फैसला चुनावी माहौल में बड़ा असर डालने वाला माना जा रहा है।
विधानसभा में "हिमाचल प्रदेश पंचायती राज (संशोधन) विधेयक, 2026’ को पारित कर दिया गया। बता दें कि विधानसभा में विधेयक पारित होने के बाद अब इसे मंजूरी के लिए राज्यपाल के पास भेजा जाएगा। मंजूरी मिलते ही यह विधेयक कानून बन जाएगा। इस विधेयक के लागू होते ही पंचायत चुनाव की प्रक्रिया में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। सरकार ने बिना लंबी बहस के इस विधेयक को मंजूरी देकर साफ संकेत दिए हैं कि पंचायत स्तर पर साफ-सुथरी राजनीति को प्राथमिकता दी जाएगी।
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नए कानून के तहत चिट्टा (नशा) तस्करी से जुड़े लोगों को पंचायत चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं होगी। सरकार का मानना है कि नशे के कारोबार से जुड़े लोगों को जनप्रतिनिधि बनने से रोकना जरूरी है, ताकि गांव स्तर पर स्वच्छ प्रशासन सुनिश्चित किया जा सके।
विधेयक में यह भी प्रावधान किया गया है कि यदि कोई व्यक्ति चुनाव जीतने के बाद नशा तस्करी में संलिप्त पाया जाता है और उसके खिलाफ आरोप तय हो जाते हैं, तो उसकी सदस्यता तुरंत समाप्त कर दी जाएगी। यह नियम प्रधान से लेकर जिला परिषद सदस्य तक सभी पर लागू होगा।
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सरकार ने सिर्फ नशा तस्करों तक ही दायरा सीमित नहीं रखा है। सहकारी बैंकों या सोसाइटियों के डिफाल्टर और पंचायत ऑडिट में जिन लोगों पर रिकवरी लंबित है, उन्हें भी चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित किया गया है। इससे पंचायतों में आर्थिक अनुशासन लाने की कोशिश की जा रही है।
संशोधन के तहत ग्राम सभा की बैठक के लिए कोरम की शर्त भी बदली गई है। अब कुल परिवारों के बजाय कुल मतदाताओं के 10 प्रतिशत की उपस्थिति को पर्याप्त माना जाएगा। इससे ग्राम सभाओं की कार्यप्रणाली में लचीलापन आने की उम्मीद है।
प्रदेश में करीब 3600 पंचायतों में जल्द चुनाव प्रस्तावित हैं। ऐसे में यह नया कानून हजारों संभावित उम्मीदवारों को सीधे प्रभावित कर सकता है। हर बार बड़ी संख्या में उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतरते हैं, लेकिन इस बार कई नाम शुरुआती दौर में ही बाहर हो सकते हैं।
सरकार ने इस कदम के जरिए स्पष्ट किया है कि पंचायत स्तर पर स्वच्छ छवि और जवाबदेही को बढ़ावा देना उसकी प्राथमिकता है। चुनावी माहौल के बीच लिया गया यह फैसला आने वाले दिनों में ग्रामीण राजनीति की दिशा तय कर सकता है।