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August 3, 2026
हिमाचल : विधवा मां का दर्द- PGI में जिंदगी की जंग लड़ रहा इकलौता बेटा, लोगों से मांगी मदद
सुभाष बूढ़ी मां का इकलौता सहारा है
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ऊना। एक सड़क हादसे ने हिमाचल के एक गरीब परिवार की दुनिया बदल दी है। जो बेटा रोज कमाकर अपनी बुजुर्ग मां का सहारा बना हुआ था, वह आज अस्पताल के बिस्तर पर जिंदगी की जंग लड़ रहा है। इलाज का खर्च लाखों में पहुंच चुका है और परिवार के पास अब उम्मीद के अलावा कुछ नहीं बचा।
ऐसे में परिजनों ने सरकार, प्रशासन और समाज से मदद की अपील की है। ऊना जिले के अंब उपमंडल के दिलवां में 25 जुलाई को हुए भीषण सड़क हादसे के बाद गंभीर रूप से घायल 44 वर्षीय सुभाष कुमार की हालत अब भी चिंताजनक बनी हुई है।
गांव कुनेरन निवासी सुभाष PGI चंडीगढ़ के आपातकालीन वार्ड में भर्ती हैं, जहां वह बेहोशी की हालत में जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं। लगातार बढ़ रहे इलाज के खर्च ने परिवार की आर्थिक कमर तोड़ दी है।
परिजनों के अनुसार सुभाष कुमार चंडीगढ़ की एक फैक्ट्री में काम कर परिवार का गुजारा चलाते थे। 25 जुलाई को वह अपनी बुजुर्ग मां से मिलने गांव लौट रहे थे। उन्होंने एक टैक्सी में लिफ्ट ली थी, लेकिन अंब के समीप दिलवां में दो वाहनों की टक्कर में वह गंभीर रूप से घायल हो गए।
हादसे में उनकी बाईं टांग तीन स्थानों से फ्रैक्चर हो गई। गंभीर चोटों के चलते उनके हृदय में भी दिक्कत उत्पन्न हुई, जिसके बाद डॉक्टरों को आपात स्थिति में स्टेंट डालना पड़ा। फिलहाल उनकी हालत नाजुक बनी हुई है और वह डॉक्टरों की निगरानी में हैं।
सुभाष चार विवाहित बहनों के इकलौते भाई हैं। उनके पिता का पहले ही निधन हो चुका है। घर में सिर्फ उनकी वृद्ध मां विशंबरी देवी हैं, जो दूसरों के घरों में काम कर किसी तरह अपना जीवनयापन करती हैं। परिवार का कहना है कि सुभाष ही घर की आर्थिक जिम्मेदारी संभालते थे और मां के बुढ़ापे का एकमात्र सहारा थे।
सुभाष की बहन नरेश कुमारी ने बताया कि परिवार इलाज का खर्च उठाने में पूरी तरह असमर्थ हो चुका है। उन्होंने कहा कि हर गुजरते दिन के साथ अस्पताल का खर्च बढ़ता जा रहा है और परिवार के पास अब कोई साधन नहीं बचा है। उनकी अपील है कि समय रहते मदद मिल जाए तो उनके भाई का बेहतर इलाज संभव हो सकेगा।
परिजनों ने जिला प्रशासन, हिमाचल प्रदेश सरकार, जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संस्थाओं और दानदाताओं से आर्थिक सहयोग की अपील की है। उनका कहना है कि समाज की छोटी-छोटी मदद भी एक परिवार की उम्मीद बचा सकती है और एक बुजुर्ग मां का इकलौता सहारा छिनने से बच सकता है।