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February 8, 2026
हिमाचल पर गहराया आर्थिक संकट : रुक सकता है कर्मचारियों का DA-एरयिर, जनता पर भी पड़ेगा असर
स्वास्थ्य योजनाओं और विकास पर भी ब्रेक के आसार
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शिमला। हिमाचल प्रदेश की वित्तीय सेहत इस समय अपने सबसे नाजुक दौर में पहुंच चुकी है। सरकार के ही वित्त विभाग द्वारा पेश किए गए ताजा आंकड़े यह साफ संकेत दे रहे हैं कि राज्य की अर्थव्यवस्था गंभीर दबाव में है।
हालात ऐसे बन चुके हैं कि सरकार के सामने न केवल कर्मचारियों-पेंशनरों की देनदारियां चुकाने की चुनौती है। बल्कि विकास, कल्याणकारी योजनाएं और नीतिगत फैसले भी सीधे तौर पर प्रभावित हो रहे हैं। आर्थिक संकट अब सिर्फ चेतावनी नहीं, बल्कि रोजमर्रा के प्रशासनिक फैसलों में साफ झलकने लगा है।
प्रदेश सरकार की माली हालत का सबसे बड़ा असर सरकारी कर्मचारियों और पेंशनरों पर पड़ता दिखाई दे रहा है। सुक्खू सरकार ने यह स्वीकार कर लिया है कि मौजूदा परिस्थितियों में महंगाई भत्ता (DA) और उसके एरियर का भुगतान करना संभव नहीं है।
आंकड़ों के अनुसार वेतन और पेंशन संशोधन से जुड़ी देनदारियां करीब 8,500 करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी हैं, जबकि DA और DR के एरियर का बोझ लगभग 5,000 करोड़ रुपये का है। स्थिति यह है कि नया वेतन आयोग लागू करने की बात तो दूर, सरकार के लिए वर्तमान वेतन ढांचे को बनाए रखना भी मुश्किल होता जा रहा है। आने वाले समय में DA की अगली किस्त जारी होने पर भी संशय बना हुआ है, जिससे कर्मचारियों और पेंशनरों में असंतोष बढ़ना तय माना जा रहा है।
आर्थिक तंगी का असर अब आम जनता से जुड़ी योजनाओं पर भी पड़ने लगा है। सरकार ने माना है कि ‘हिमकेयर’ और ‘सहारा’ जैसी अहम स्वास्थ्य योजनाओं की लंबित देनदारियों का भुगतान करना फिलहाल संभव नहीं है। इन योजनाओं से हजारों जरूरतमंद परिवार जुड़े हुए हैं, जिनके इलाज और सहायता पर अब अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं।
विकास कार्यों की बात करें तो लगभग 2,000 करोड़ रुपये की देनदारियां अगले वित्त वर्ष के लिए टल चुकी हैं। हालात यह हैं कि केंद्र प्रायोजित योजनाओं के लिए जरूरी मैचिंग ग्रांट तक सरकार नहीं जुटा पा रही है। इसका सीधा मतलब यह है कि नए विकास कार्यों की शुरुआत लगभग असंभव हो चुकी है और चल रही परियोजनाओं की रफ्तार भी धीमी पड़ सकती है।
राज्य की आर्थिक कमजोरी अब सरकार के नीतिगत और कानूनी दायित्वों को भी प्रभावित कर रही है। विभिन्न अदालतों के आदेशों के तहत सरकार को करीब 1,000 करोड़ रुपये का भुगतान करना है, लेकिन मौजूदा वित्तीय स्थिति में यह राशि देना भी सरकार के लिए चुनौती बना हुआ है।
इन हालातों को देखते हुए सरकार को सब्सिडी पर पुनर्विचार जैसे कड़े फैसलों की ओर बढ़ना पड़ सकता है। संकेत मिल रहे हैं कि कई प्रकार की सब्सिडी या तो सीमित की जा सकती हैं या पूरी तरह बंद भी हो सकती हैं। इसके साथ ही बढ़ते वित्तीय बोझ के चलते यूनिफाइड पेंशन स्कीम (यूपीएस) पर भी दोबारा गंभीरता से विचार करना पड़ सकता है।
आने वाले समय की तस्वीर और भी चिंताजनक नजर आ रही है। वित्तीय विश्लेषण बताते हैं कि यदि सरकार अपनी पुरानी देनदारियों पर रोक लगा दे, चल रही विकास परियोजनाएं बंद कर दे और सभी सब्सिडी समाप्त भी कर दे, तब भी अगले वित्त वर्ष में करीब 6,000 करोड़ रुपये का घाटा बना रहेगा।
यह आंकड़े इस बात की ओर इशारा करते हैं कि समस्या सिर्फ खर्चों की नहीं, बल्कि राज्य की आय और वित्तीय ढांचे से जुड़ी गहरी है। मौजूदा हालात में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह इस आर्थिक भंवर से प्रदेश को कैसे बाहर निकालती है, ताकि प्रशासन, विकास और जनकल्याण की गाड़ी पटरी पर लौट सके।