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September 9, 2026

हिमाचल : टिपर ड्राइवर पर चल रहा था रे**प केस, लड़की ने बदला बयान- हुआ बरी

परिजनों ने कसुम्पटी पुलिस चौकी में शिकायत दर्ज करवाई थी

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शिमला। हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला की विशेष फास्ट ट्रैक अदालत (पॉक्सो) ने 13 वर्षीय किशोरी से दुष्कर्म और अपहरण के मामले में आरोपी टिपर चालक को बरी कर दिया है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विवेक शर्मा की अदालत ने मामले में अभियोजन पक्ष के प्रमुख गवाहों के आरोपों का समर्थन नहीं करने और DNA  साक्ष्यों से जुड़ी प्रक्रिया में गंभीर कमियां पाए जाने के बाद आरोपी को संदेह का लाभ दिया।

दुष्कर्म का आरोपी बरी

अदालत के फैसले के बाद आरोपी वीरू को उसके खिलाफ लगाए गए दुष्कर्म और अपहरण के आरोपों से राहत मिल गई है। अदालत ने अपने निर्णय में आपराधिक मामलों में अभियोजन पक्ष की उस जिम्मेदारी को भी रेखांकित किया, जिसके तहत आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित करना आवश्यक होता है।

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अगस्त 2025 में सामने आया था मामला

यह मामला 26 अगस्त 2025 का है। किशोरी के लापता होने के बाद उसके परिजनों ने कसुम्पटी पुलिस चौकी में शिकायत दर्ज करवाई थी। शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने किशोरी की तलाश शुरू की और जांच के दौरान नेपाल निवासी वीरू को मामले में आरोपी बनाया।

13 साल की लड़की को ले गया था...

अभियोजन पक्ष की ओर से अदालत में यह आरोप लगाया गया कि आरोपी ने 13 साल की किशोरी को बहला-फुसलाकर अपने साथ ले गया था। आरोप के मुताबिक, किशोरी को तारादेवी से एक टिपर के माध्यम से हरियाणा ले जाया गया और वहां उसके साथ दुष्कर्म किया गया।

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आरोपी को पुलिस ने किया गिरफ्तार

पुलिस ने जांच के आधार पर आरोपी के खिलाफ BNS और पॉक्सो एक्ट के प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया था। इसके बाद पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर मामले की जांच आगे बढ़ाई और अदालत में अभियोजन पक्ष की ओर से विभिन्न साक्ष्य और गवाह पेश किए गए।

अदालत में पीड़िता ने दिया बयान

मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष को सबसे महत्वपूर्ण झटका तब लगा, जब पीड़िता ने ही अदालत में पुलिस की ओर से लगाए गए आरोपों का समर्थन नहीं किया। अदालत के समक्ष दिए गए बयान में किशोरी ने बताया कि तीज उत्सव के बाद देर हो जाने के कारण वह अपनी सहेली के घर रुक गई थी। उसने अदालत में अपने साथ किसी तरह की गलत घटना होने से इनकार किया।

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सहेली के घर रुकी थी पीड़िता

पीड़िता के इस बयान के बाद अभियोजन पक्ष की ओर से पेश की गई घटना की पूरी कहानी कमजोर पड़ गई। चूंकि मामले में पीड़िता मुख्य गवाह थी, इसलिए उसके बयान का अभियोजन के आरोपों को साबित करने में महत्वपूर्ण महत्व था।

बुआ, दादी और सहेली ने भी बदले बयान

सुनवाई के दौरान केवल पीड़िता ही नहीं, बल्कि मामले से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण गवाह भी अभियोजन पक्ष के आरोपों के समर्थन में सामने नहीं आए। शिकायतकर्ता बुआ और दादी के अलावा किशोरी की सहेली के बयान भी पुलिस की ओर से लगाए गए आरोपों को मजबूती नहीं दे सके।

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आरोपों की नहीं हुई पुष्टि

अभियोजन पक्ष के प्रमुख गवाहों के अपने पहले के कथित बयानों से अलग रुख अपनाने के कारण आरोपी के खिलाफ आरोपों को प्रमाणित करना मुश्किल हो गया। अदालत के सामने ऐसी स्थिति पैदा हो गई, जिसमें अभियोजन की ओर से पेश किए गए मौखिक साक्ष्यों से आरोपी के खिलाफ आरोपों की पुष्टि नहीं हो सकी।

DNA साक्ष्यों की प्रक्रिया पर भी उठे सवाल

मामले में वैज्ञानिक साक्ष्य के तौर पर DNA जांच से जुड़े पहलुओं को भी अदालत के सामने रखा गया था। हालांकि, अदालत ने डीएनए साक्ष्य जुटाने और उसकी जांच तक अपनाई गई प्रक्रिया में गंभीर खामियां पाईं।

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कोर्ट में नहीं कर पाए साबित

अदालत के समक्ष साक्ष्य एकत्र करने और DNA प्रक्रिया से जुड़े कई पहलुओं को लेकर सवाल सामने आए। इन कमियों के चलते वैज्ञानिक साक्ष्य को आरोपी के खिलाफ ऐसा निर्णायक प्रमाण नहीं माना गया, जिसके आधार पर दोष सिद्ध किया जा सके। अदालत ने मौखिक गवाहियों और वैज्ञानिक साक्ष्यों को समग्र रूप से देखते हुए पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को आवश्यक कानूनी स्तर तक साबित करने में सफल नहीं रहा।

आरोपों के ठोस साक्ष्य

अदालत ने फैसले में स्पष्ट किया कि किसी आपराधिक मामले में केवल आरोप लगना पर्याप्त नहीं होता। अभियोजन पक्ष पर यह जिम्मेदारी होती है कि वह आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को ठोस साक्ष्यों के आधार पर संदेह से परे साबित करे।

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आरोपी को किया बरी

इस मामले में मुख्य गवाह यानी पीड़िता ने अभियोजन के आरोपों का समर्थन नहीं किया। इसके अलावा अन्य प्रमुख गवाहों के बयान भी अभियोजन की कहानी को पुष्ट नहीं कर सके। वहीं, डीएनए साक्ष्यों की प्रक्रिया में सामने आई कमियों ने वैज्ञानिक साक्ष्य की विश्वसनीयता को लेकर भी सवाल खड़े किए।

 

ऐसी परिस्थितियों में अदालत ने आरोपी को संदेह का लाभ देना उचित माना। इसी आधार पर अदालत ने नेपाल निवासी वीरू को किशोरी के अपहरण और दुष्कर्म के आरोपों से बरी कर दिया।

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गवाह और वैज्ञानिक साक्ष्य रहे अहम

इस मामले का फैसला एक बार फिर यह दर्शाता है कि गंभीर आपराधिक मामलों में आरोपों को साबित करने के लिए गवाहों के विश्वसनीय बयान और साक्ष्य जुटाने की सही कानूनी प्रक्रिया कितनी महत्वपूर्ण होती है। अदालत ने मामले में उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करते हुए यह देखा कि क्या अभियोजन आरोपी के खिलाफ आरोपों को कानूनी कसौटी पर संदेह से परे साबित कर पाया है।

दुष्कर्म और अपहरण के लगे थे आरोप

प्रमुख गवाह अभियोजन के आरोपों के अनुरूप बयान नहीं दे सके और DNA साक्ष्य की प्रक्रिया में भी कमियां पाई गईं, इसलिए अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराने के बजाय संदेह का लाभ दिया। इस प्रकार विशेष फास्ट ट्रैक पॉक्सो अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर वीरू को दुष्कर्म और अपहरण के आरोपों से बरी कर दिया।

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