#अव्यवस्था
April 22, 2026
हिमाचल : 8 साल से कोमा में संजीव, सरकार ने बंद की सहारा योजना- पत्नी ने हाथ जोड़कर मांगी मदद
संजीव का बेटा भी 42 प्रतिशत दिव्यांग है
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ऊना। हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले से एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो मानवीय संवेदनाओं को गहराई से झकझोर देती है। हरोली उपमंडल के लूथड़े गांव में 48 वर्षीय संजीव कुमार पिछले आठ वर्षों से कोमा में बिस्तर पर पड़े हैं। उनके जीवन की लड़ाई अब पूरी तरह परिवार के हौसले और उम्मीदों पर टिकी हुई है।
संजीव कुमार की पत्नी मोनिका और उनका बेटा मोहित शर्मा, जो खुद 42 प्रतिशत दिव्यांग हैं दिन-रात उनकी सेवा में लगे हुए हैं। यह परिवार हर दिन एक नई चुनौती के साथ जी रहा है, लेकिन हालात के आगे झुकने को तैयार नहीं है।
मोनिका बताती हैं कि करीब आठ साल पहले उनके पति डिप्रेशन से जूझ रहे थे। इसी दौरान एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बाद उनकी हालत इतनी बिगड़ गई कि वे कोमा में चले गए। उन्हें इलाज के लिए PGI चंडीगढ़ ले जाया गया, जहां लंबे समय तक उपचार चला। मगर बाद में डॉक्टरों ने उन्हें घर ले जाकर देखभाल करने की सलाह दे दी। तब से लेकर आज तक संजीव बिस्तर पर हैं और परिवार ही उनका सहारा बना हुआ है।

इस लंबी बीमारी ने परिवार की आर्थिक स्थिति पूरी तरह तोड़ दी है। इलाज में उनकी सारी जमा पूंजी खर्च हो चुकी है। रिश्तेदारों और जान-पहचान वालों से मदद लेकर भी किसी तरह गुजारा किया गया। मगर अब हालत यह है कि रोजमर्रा का खर्च और दवाइयों की व्यवस्था करना भी बेहद मुश्किल हो गया है।
हर महीने करीब पांच हजार रुपये सिर्फ दवाइयों और देखभाल पर खर्च हो जाते हैं। जबकि आय का कोई स्थायी साधन नहीं है। परिवार के पास अपना घर तक नहीं है और वे रिश्तेदारों के सहारे रह रहे हैं।

परिवार की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं होतीं। मोनिका बताती हैं कि उन्हें सरकार की सहारा योजना के तहत हर महीने दो हजार रुपये की पेंशन मिलती थी, जिससे कुछ राहत मिल जाती थी। मगर पिछले एक वर्ष से यह पेंशन बंद पड़ी है। कई बार विभागों के चक्कर काटने के बावजूद समस्या का कोई समाधान नहीं निकल पाया है। इससे परिवार की परेशानियां और बढ़ गई हैं।
मोनिका की आंखें तब नम हो जाती हैं, जब वह कहती हैं कि बीते आठ वर्षों में बहुत कुछ बदल गया, लेकिन उनका विश्वास आज भी कायम है। वह अपने पति की सेवा को अपना धर्म मानती हैं और हर दिन इस उम्मीद में जी रही हैं कि एक दिन संजीव फिर से आंखें खोलेंगे।
वहीं, बेटे मोहित शर्मा का संघर्ष भी कम नहीं है। खुद दिव्यांग होने के बावजूद उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी। वह बताते हैं कि बचपन से ही उन्होंने कठिन परिस्थितियों में जीवन बिताया है, लेकिन परिवार ने कभी उम्मीद नहीं छोड़ी। वह आज भी पूरे समर्पण के साथ अपने पिता की सेवा में जुटे हैं।

मोहित का कहना है कि उनका परिवार कोई बड़ी मांग नहीं कर रहा। उनकी बस इतनी इच्छा है कि सहारा योजना की बंद पेंशन फिर से शुरू हो जाए, पिता के इलाज के लिए कुछ आर्थिक सहायता मिल सके।
अगर संभव हो तो बेहतर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध करवाई जाए। उनका मानना है कि अगर सरकार और समाज से थोड़ा सा सहयोग मिल जाए- तो शायद उनके पिता के इलाज में नई उम्मीद जग सकती है।
यह कहानी सिर्फ एक परिवार की पीड़ा नहीं, बल्कि उन योजनाओं की जमीनी हकीकत भी सामने लाती है, जो जरूरतमंदों तक समय पर नहीं पहुंच पातीं। अब यह परिवार मदद की आस में है। इस उम्मीद के साथ कि उनकी आवाज जिम्मेदार लोगों तक पहुंचेगी और उनके संघर्ष में कोई हाथ थामने वाला जरूर मिलेगा।