#अव्यवस्था
May 5, 2025
हिमाचल : एक साल से टूटी मलाणा की एप्रोच रोड, तिगुनी कीमत पर पहुंच रहा राशन- मरीज पीठ पर
PWD मंत्री का ध्यान अपने इलाके की सड़कों पर
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कुल्लू। हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले की ओर कोई देखने वाला नहीं है, क्योंकि सरकार और प्रदेश के PWD मंत्री विक्रमादित्य का सारा ध्यान शिमला और रामपुर में सड़कों का जाल बिछाने पर है। नतीजा यह कि पिछली बारिश में टूटी मलाणा गांव की सड़क अभी तक नहीं बन पाई है।
इसके चलते लोगों तक तीन गुना अधिक कीमत में राशन पहु्ंच रहा है, जबकि मरीजों को चारपाई पर लिटाकर कंधे पर चार घंटे तक पैदल चलकर एंबुलेंस रोड तक पहुंचाना पड़ रहा है। सड़क पिछले साल की बारिश में टूटी थी और इस बात को अब 10 महीने गुजर चुके हैं। लेकिन सड़क बनवाने की बात शायद सरकार भूल चुकी है, तभी गांव के लोगों के लिए कोई वैकल्पिक एप्रोच रोड भी नहीं बनाई गई।
सड़क टूटने के बाद मलाणा गांव के लोग खड़ी पहाड़ी से होकर जाने वाला पुराने रास्ते पर ही गुजारा कर रहे हैं, जो खतरनाक भी है और उससे पक्की सड़क तक पहुंचने में 4 घंटे का वक्त लगता है। गांव के लोगों का एकमात्र संपर्क पहाड़ी के नीचे प्रोजेक्ट ऑफिस है। जहां तक पहुंचने में जान जोखिम में डालनी पड़ती है। यहां तक गांव के डिपो तक राशन पहुंचाने में भारी मशक्कत करनी पड़ रही है।
इससे पहले सरकार ने वायर स्पैन से तार के जरिए राशन की बोरियों को गांव तक पहुंचाने की कोशिश की थी, लेकिन इस सिस्टम पर देव कमेटी का कब्जा हो जाने से उसी खतरनाक पहाड़ी रास्ते से राशन की बोरियां ले जानी पड़ रही हैं, जिससे लोग अभी आवाजाही कर रहे हैं।
सड़क न होने से मलाणा गांव के लोगों को चावल की एक बोरी 4200 रुपए में खरीदनी पड़ रही है, क्योंकि ये बोरिया मजदूर ऊपर गांव तक लेकर आते हैं। सड़क से पहुंचाने पर यही बोरी 1500 रुपए की पड़ती है। गांव के लोग बाकी जरूरी सामानों को भी 3 से 4 गुना अधिक कीमत चुकाकर खरीद रहे हैं।
कच्ची सड़क पर सबसे ज्यादा जोखिम मरीजों को पीठे पर लादकर ले जाने में होता है। इस खतरनाक रास्ते पर जरा भी पैर फिसलने का मतलब है, मरीज और उसे ले जाने वाले दोनों पर हादसे का खतरा। ऊपर से प्रोजेक्ट आफिस तक पहुंचने में 4 घंटे का लगने वाला वक्त गंभीर रूप से बीमार मरीजों की जान पर खतरा बन जाता है।
केवल सड़क ही नहीं, मलाणा गांव तक पहुंचने का पुल भी बीती बरसात में बह चुका है। गांव के लोगों ने काम चलाऊ अस्थायी पुल बनाई थी, जो अब डूबने की कगार पर है। अगर प्रशासन ने समय रहते बरसात से पहले लोहे का पक्का पुल नहीं बनाया तो समूचे बरसात के सीजन में गांव का संपर्क सड़क के रास्ते कटा रहेगा।