#अव्यवस्था
May 2, 2025
हिमाचल: योजनाओं पर खर्च के बजाय बैंकों में जमा कर दिए 12 हजार करोड़, CM ने वापस मांगे
सरकारी विभागों की लापरवाही, अब ब्याज समेत लौटाने होंगे
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शिमला। हिमाचल प्रदेश में विभिन्न सरकारी विभागों की एक बड़ी लापरवाही सामने आई है। इन विभागों ने साल 2010 से लेकर 2023 तक के 13 साल में विकास योजनाओं के आवंटित रकम को खर्च करने के बजाय बैंकों में ब्याज पर चला दिया। अब CM सुक्खू ने सभी विभागों से यह रकम ब्याज सहित सरकारी खजाने में लौटाने को कहा है।
CM ने इसके लिए वित्त सचिव अभिषेक जैन को 10 मई तक का वक्त दिया है। कानूनन अगर योजनाओं पर आवंटित राशि अगर खर्च नहीं की जाती है तो अगले बजट में यह पैसा अपने आप ही राज्य के खजाने में लौट आता है। इसके बाद सरकार संबंधित विभाग की बिना खर्च राशि को उसी विभाग की योजना से जोड़कर आगे का आवंटन करती है, या फिर उस पैसे को अन्य किसी विकास योजना में आवंटित किया जाता है।
लेकिन, हिमाचल प्रदेश में उल्टा ही खेल हो गया। विभागों ने योजनाओं का पैसा खर्च करने की जगह उसे बैंकों में फिक्स डिपॉजिट तो कहीं सेविंग्स में दिखाया तो कुछ बैंकों में यह पैसा करेंट अकाउंट में डाला गया। पूरी रकम 12,210 करोड़ रुपए की है। सरकार नियमों के अनुसार, सरकार का पैसा ट्रेजरी की सहमति के बिना बैंकों में नहीं रखा जा सकता। विभागों ने इस रकम को 32 से ज्यादा बैंकों में डाल रखा है। इसमें से 6,441.6 करोड़ रुपये बचत खातों में है, जबकि 5,391.8 करोड़ रुपये एफडी के रूप में जमा है। इसके अलावा 376.6 करोड़ रुपये चालू खातों में जमा पड़ा है।
अभी यह पता नहीं चला है कि राज्य के विभिन्न विभागों ने बैंकों में पड़ी इतनी बड़ी रकम के बारे में सरकार को सूचना दी थी या नहीं, लेकिन यह जरूर है कि जो रकम नियमानुसार सरकार के खजाने में जानी चाहिए थी, उस पर सरकारी विभाग बीते 13 साल से ब्याज ले रहे थे। आपको बता दें कि मार्च में पेश हिमाचल सरकार के बजट में भी इस रकम का कोई उल्लेख नहीं है। बजट में 10 हजार करोड़ रुपए का राजकोषीय घाटा दिखाया गया है, जबकि नियम विरुद्ध तरीके से बैंकों में जमा रकम इससे ज्यादा है।
अब सवाल यह उठता है कि अगर सुक्खू सरकार जनता की हालत सुधारने के लिए आवंटित किए गए इस पैसे से राजकोषीय घाटा पूरा करती है तो यह आम लोगों को ठगे जाने जैसा मामला होगा। सूत्रों के मुताबिक, राज्य सरकार इस पैसे का उपयोग वित्तीय प्रबंधन के लिए करने की सोच रही है। यानी विकास योजनाओं पर बीते 13 साल से लगा ब्रेक अब आम जनता की उम्मीदों पर पानी फेरने वाला है। जाहिर तौर पर इसके लिए विभाग खुद जिम्मेदार हैं, लेकिन उतनी ही जिम्मेदार सरकारें भी हैं, जिन्होंने इस मामले से 13 साल तक आंखें फेरे रखीं और अब जबकि राज खुला है, दोषी विभागों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है।