सिरमौर। सीमित साधनों और ग्रामीण परिवेश के बावजूद जब मेहनत और लगन साथ हों, तो कोई भी मंज़िल दूर नहीं रहती। ऐसा ही प्रेरणादायक उदाहरण हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले से सामने आया है, यहां एक होनहार बेटे ने वह कर दिखाया है, जिसका सपना कई युवा देखते हैं। शैलेन्द्र हितैषी ने बिना किसी कोचिंग के, अपने पहले ही प्रयास में UGC-NET की परीक्षा पास कर ली है।
सीमित संसाधनों के बीच हासिल की सफलता
बता दें कि सिरमौर जिले के राजगढ़ उपमंडल की पझौता घाटी के लोगों के लिए यह वाकई गर्व और खुशी का मौका है। शैलेन्द्र ने यह मुकाम सीमित संसाधनों के बावजूद हासिल किया। उनकी इस सफलता से न सिर्फ उनका परिवार खुश है, बल्कि पूरे इलाके में खुशी की लहर दौड़ गई है।
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बीने कोचिंग के हासिल की सफलता
उन्होंने किसी महंगी कोचिंग या बड़े शहर की मदद नहीं ली। घर पर रहकर, अपने दम पर और पूरे अनुशासन के साथ पढ़ाई की। रोज़ाना समय निकालकर खुद पढ़ते रहे और अपने लक्ष्य पर पूरा भरोसा बनाए रखा। उनका कहना है कि अगर इंसान मन में ठान ले और लगातार मेहनत करे, तो हालात चाहे जैसे भी हों, रास्ता जरूर निकल आता है।
शिक्षा का सफर गांव से विश्वविद्यालय तक
शैलेन्द्र मूल रूप से राजगढ़ उपमंडल की पझौता घाटी के गांव मानवा के निवासी हैं। उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई आठवीं कक्षा तक अपने गांव के स्कूल से ही की। इसके बाद उन्होंने राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला राजगढ़ से 12वीं की परीक्षा पास की।
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आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने राजगढ़ डिग्री कॉलेज में दाखिला लिया और वहीं से स्नातक की पढ़ाई पूरी की। वर्तमान में वे हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से संगीत विषय में एमए कर रहे हैं।
संगीत की विरासत परिवार से मिली
संगीत से शैलेन्द्र का रिश्ता बचपन से ही रहा है। उन्हें संगीत की पहली सीख अपनी मां मीरा हितैषी से मिली, जो आकाशवाणी से अनुमोदित पहाड़ी कलाकार रह चुकी हैं। घर का माहौल भी संगीत से जुड़ा रहा, जिसका असर शैलेन्द्र पर साफ दिखाई देता है।
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वहीं उनके पिता सुखदेव हितैषी किसान हैं और उन्होंने बेटे को हर कदम पर आगे बढ़ने के लिए हौसला दिया। कॉलेज के दिनों में भी शैलेन्द्र ने संगीत विषय को ही चुना और इसी में आगे बढ़ने का फैसला किया।
गुरुओं और परिवार को दिया श्रेय
UGC-NET की परीक्षा पास करने का श्रेय शैलेन्द्र अपने माता-पिता, परिवार के सहयोग और अपने गुरुओं को देते हैं। उन्होंने खास तौर पर राजगढ़ कॉलेज की संगीत प्रोफेसर डॉ. सविता सहगल और नीरजा सहगल का आभार जताया, जिनके मार्गदर्शन ने उन्हें सही दिशा दिखाई।
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सहायक प्रोफेसर बनना है लक्ष्य
शैलेन्द्र का सपना यहीं खत्म नहीं होता। उनका लक्ष्य संगीत विषय में सहायक प्रोफेसर बनना है, ताकि वे इस विधा को आगे बढ़ा सकें। भविष्य में वे संगीत में पीएचडी करना चाहते हैं और सिरमौर जिले की प्राचीन संस्कृति व पारंपरिक लोकगीतों के संरक्षण के लिए काम करना चाहते हैं। शैलेन्द्र हितैषी की यह कहानी आज के युवाओं के लिए एक मजबूत संदेश है कि बिना कोचिंग, बिना बड़े संसाधनों के भी अगर मेहनत सच्ची हो, तो बड़े से बड़ा सपना पूरा किया जा सकता है।
