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June 23, 2025
हिमाचल : मजबूरियों ने छुड़वाया क्रिकेट- अब बिजली बोर्ड में टीमेट बन ट्रांसफॉर्मर ठीक कर रही अनीशा
अनीशा को अब भी है क्रिकेट का जुनून
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सिरमौर। कहते हैं कि अगर जज्बा दिल में हो तो रास्ते खुद बनते हैं, जो रात से लड़ जाए, वो सितारे भी चुनते हैं। इन्हीं शब्दों को बखूबी चरितार्थ कर दिखाया है हिमाचल के सिरमौर जिले की बेटी अनीशा अंसारी ने- जो कि आज हर किसी के लिए प्रेरणा बन चुकी है।
जिले की ऐतिहासिक नगरी नाहन की रहने वाली अनीशा अंसारी आज हर उस लड़की के लिए मिसाल बन चुकी हैं, जो सीमित संसाधनों और सामाजिक बंदिशों के बावजूद सपनों को उड़ान देना चाहती है।
एक साधारण परिवार में जन्मी अनीशा की जिंदगी संघर्षों से भरी रही, लेकिन उनके भीतर छुपी जुझारू आत्मा ने हर मोड़ पर हालात को मात दी। अनीशा को देखकर आज हर कोई उसके जज्बे को सलाम कर रहा है।
अनीशा के पिता एक कारपेंटर हैं और मां एक गृहणी। बचपन से ही घर की तंगहाली अनीशा के सामने थी, लेकिन उनके इरादे हर दिन और मजबूत होते गए। उनका दिल हमेशा क्रिकेट के लिए धड़कता था। जहां उनकी हमउम्र लड़कियां गुड़ियों से खेलती थीं, वहां अनीशा मोहल्ले की गलियों में गेंद से धूल उड़ाया करती थीं।
अनीशा ने धर्मशाला की HPCA अकादमी से पढ़ाई और क्रिकेट दोनों को एक साथ साधा। 12वीं की पढ़ाई धर्मशाला से पूरी करने के बाद उन्होंने अमृतसर से स्नातक की डिग्री हासिल की। बतौर मीडियम पेस बॉलर, अनीशा ने हिमाचल महिला रणजी टीम में 50 से ज्यादा मुकाबले खेले और कई बार टीम को अपनी शानदार गेंदबाजी से जीत दिलाई।
उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन आंध्र प्रदेश के खिलाफ रहा, जहां उन्होंने विपक्ष की कमर तोड़ दी थी। कड़ी मेहनत और लगातार अच्छे प्रदर्शन के बल पर दो बार उन्हें नेशनल क्रिकेट कैंप में भी बुलाया गया, लेकिन दुर्भाग्य से वे अंतिम टीम का हिस्सा नहीं बन सकीं।
जब जिंदगी ने खेल के मैदान से अलग किया, तब अनीशा के सामने रोज़गार की चुनौती खड़ी हो गई। मगर उन्होंने मैदान बदला, हौसला नहीं। वर्ष 2024 में हिमाचल प्रदेश स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड (HPSEB) में टी-मेट के रूप में नियुक्त हुईं।
आज वे ट्रांसफार्मर और हाई वोल्टेज बिजली लाइनों पर काम करने वाली उन चंद महिलाओं में से एक हैं जो इस चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारी को पूरे साहस और आत्मविश्वास से निभा रही हैं। जब अनीशा बिजली के खंभे पर चढ़ती हैं तो राहगीरों की नजरें ठहर जाती हैं- उनकी चाल, उनकी आंखों का आत्मविश्वास, और शरीर की फुर्ती आज भी बताती है कि खिलाड़ी अभी भी जिंदा है।
अनीशा की कार्यशैली और समर्पण को देखते हुए विभागीय अधिकारी भी उनके कायल हैं। अब उन्हें विभागीय स्तर पर आगे बढ़ने के मौके दिए जा रहे हैं और उन्हें “बिजली बोर्ड की बेटी” कहकर सम्मानित किया जा रहा है।
आज भी अनीशा का दिल क्रिकेट के लिए धड़कता है। वे कहती हैं, “अगर विभाग से अनुमति मिली और मौका मिला, तो मैं फिर से मैदान में उतरूंगी।” उनके यह शब्द साबित करते हैं कि असली खिलाड़ी कभी रिटायर नहीं होते, वे केवल अपनी भूमिका बदलते हैं।
लोगों का कहना है कि अनीशा अंसारी की कहानी उन हजारों बेटियों के लिए उम्मीद की किरण है, जो सीमाओं के घेरे में जन्म लेती हैं लेकिन खुले आसमान में उड़ने का सपना देखती हैं। उन्होंने यह साबित कर दिया कि संघर्ष अगर सच्चा हो, तो कामयाबी किसी की मोहताज नहीं होती। अनीशा सिर्फ एक खिलाड़ी नहीं, एक प्रेरणा हैं-जो यह बताती हैं कि सपनों को सिर्फ देखा नहीं जाता, जीया भी जाता है।