#हादसा
January 11, 2026
बस की खराबी ने छीनी 14 जिंदगियां! कंडक्टर ने ड्राइवर को किया था आगाह, घायलों ने खोले बड़े राज
टायर में ग्रीस कम होने सा आ रही आवाज
शेयर करें:

सिरमौर। हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के हरिपुरधार में हुए दर्दनाक बस हादसे ने कुपवी क्षेत्र के लोगों के जीवन में गहरा शोक छोड़ दिया है। माघी पर्व मनाने के लिए घर लौट रहे लोग यह नहीं जान पाए कि उनका यह सफर आखिरी होगा। शिमला से कुपवी की ओर जा रही बस पलट गई, जिसमें 14 लोगों की जान चली गई। हादसे में अधिकांश यात्री कुपवी उपमंडल के निवासी थे। अस्पताल में इलाज करा रहे घायल अब बस और अस्पताल की स्थिति को लेकर कई खुलासे कर रहे हैं।
घायलों ने बताया कि वे कुपवी के बागी गांव जा रहे थे। रास्ते में बस कई जगहों पर जोर-जोर से टक-टक की आवाजें कर रही थी। जब बस हरिपुरधार से लगभग 200 मीटर पहले पहुंची, तभी भी आवाज तेज हुई और बस अचानक पलट गई।
दो पलटने के बाद बस की छत टूट गई, और सवारियां छत से नीचे गिर गईं। जिसके बाद घायलों को अस्पताल पहुंचाया गया। दो पलटने के बाद बस की छत टूट गई और सवारियां इधर-उधर गिरने लगीं। माघी की खुशी उस पल चीख-पुकार में बदल गई।
हादसे के बाद घायल लोगों के परिजन बीते शनिवार सुबह ही अस्पताल पहुंच गए। सुबह 9 बजे से ही सर्जरी, ऑर्थो और गायनी वार्ड में भारी भीड़ लग गई। घायलों ने यह भी बताया कि बस के पट्टे और टायर में ग्रीस कम था और बस में आवाज आने के बावजूद कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया।
सिरमौर जिले के अस्पताल की व्यवस्था भी हादसे के बाद सामने आ गई है। अस्पतालों में केवल पेन रिलीफ इंजेक्शन ही उपलब्ध हैं, बाकी दवाइयां पर्याप्त मात्रा में नहीं हैं। मरीजों ने बताया कि हरिपुरधार और राजगढ़ अस्पताल में स्वास्थ्य सुविधाएं बहुत कमजोर हैं। अगर वहीं बेहतर इलाज होता, तो उन्हें चार घंटे तक दर्द में तड़पना नहीं पड़ता।
कुपवी क्षेत्र के लोगों के लिए सरकारी बस सेवा नाम मात्र की ही है। बसें आती-जाती हैं, लेकिन उनकी समय-सूची और आने-जाने की जानकारी नहीं होती। यही वजह है कि 15 पंचायतों के करीब 30,000 लोग निजी बसों पर निर्भर हैं। संकरी और खराब सड़कों की वजह से यात्रा और भी खतरनाक हो जाती है। खासकर माघी और बीशू जैसे पर्वों के समय भी अतिरिक्त बस सेवा नहीं चलती।
हिमाचल में सार्वजनिक परिवहन की स्थिति चिंताजनक है। नियमों के मुताबिक बसों को 15 साल पूरे होने या फिटनेस टेस्ट में फेल होने पर स्क्रैप किया जाना चाहिए। लेकिन पहाड़ी इलाकों की कठिन सड़कें बसों की उम्र कम कर देती हैं। कई बसें तकनीकी रूप से कमजोर हो चुकी हैं और दुर्घटना का खतरा बढ़ा देती हैं। वर्तमान में एचआरटीसी बेड़े में करीब 500 जर्जर बसें हैं, जिन्हें चरणबद्ध तरीके से हटाने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।
स्टाफ की कमी के कारण कई चालक सुबह 6 बजे से रात 8 बजे तक ड्यूटी कर रहे हैं। बीच में छोटे ब्रेक मिलने के बावजूद यह समय मोटर ट्रांसपोर्ट वर्कर एक्ट 1961 के तहत अधिक माना जाता है। लंबे रूट और थकान के कारण दुर्घटनाओं का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
हादसे में कई परिवार बिखर गए। कुछ लोग शिमला में काम कर रहे थे और माघी पर्व मनाने घर लौट रहे थे। एक परिवार के माता-पिता और उनका बेटा एक साथ मर गए, और उनके गांव में एक साथ अंतिम संस्कार किया गया। कई अन्य परिवारों ने अपने प्रियजन खो दिए और अब उनका घर अंधकार में डूबा हुआ है।