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February 20, 2025
हिमाचल: मक्खियां लेकर आ रही हैं जानलेवा बैक्टीरिया, खाने पर बैठीं तो मिलेगी लाइलाज बीमारी
आईआईटी मंडी के सहयोग से दिल्ली विश्वविद्यालय का रिसर्च, दवाएं भी बेअसर
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मंडी। अगर आपके घर के आसपास भैंसों का तबेला या पोल्ट्री फार्म है तो सावधान। मक्खियों को वैसे भी बीमारी फैलाने वाला माना जाता है। लेकिन अब ये मक्खियां एक जानलेवा बैक्टीरिया लेकर आई हैं। ये ऐसे बैक्टीरिया हैं, जिन पर दवाएं भी बेअसर हैं। जैसे ही ये मक्खियां आपके भोजन पर बैठती हैं तो इनके शरीर पर चिपका बैक्टीरिया भोजन के रास्ते आपके शरीर में आ जाता है। फिर आप लाख इलाज कराएं, दवाओं का कोई असर नहीं होगा। नतीजा है मौत।
आईआईटी मंडी के सहयोग से यह खुलासा दिल्ली विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने किया है। शोधकर्ताओं में डॉ. नीतीश रावत वर्तमान में आईआईटी मंडी में कार्यरत हैं। डॉ. नीतीश रावत वर्तमान में आईआईटी मंडी के स्कूल ऑफ बायोसाइंसेज एंड बायोइंजीनियरिंग में कार्यरत हैं। उन्होंने कहा कि मूल शोध डॉ. श्रेयता सिंह का है, उन्होंने इसमें सहयोग किया है।
शोधकर्ताओं ने मेरठ के एक पोल्ट्री फार्म में जब जांच की तो 68.6 प्रतिशत घरेलू मक्खियों ने ई-कोलाई बैक्टीरिया को पनाह दी हुई थी। इनमें से 80 प्रतिशत बैक्टीरिया एमडीआर था, यानी मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट बैक्टीरिया (MDR ) था। इस पर बहुत सी एंटीबायोटिक दवाओं का असर नहीं हो सकता था।
यही मक्खियां स्वाभाविक रूप से आसपास के घरों में भी पहुंच रही थीं तो इससे लोगों को भी इस बैक्टीरिया की चपेट में आने का खतरा बढ़ जाता है। इस बैक्टीरिया के कारण रोगी मनुष्य पर भी एंटीबायोटिक असर नहीं करेगी।
डॉ. नीतीश रावत ने बताया कि पोल्ट्री फार्मों में मुर्गियों को खूब एंटीबायोटिक खिलाने का चलन है। एंटीबायोटिक खिलाने से इन कुक्कुटों का वजन और आकार ढाई महीने में ढाई किलो तक बढ़ जाता है। वरना इनके बड़े होने में कई महीने भी लग सकते हैं। एंटीबायोटिक खिलाने से इनमें मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट बैक्टीरिया पैदा हो जाता है।
शिमला में एक अध्ययन के दौरान विभिन्न पर्यावरणीय नमूनों से 30 बैक्टीरियल प्रजातियों की पहचान की गई, जिनमें से 63.33% MDR थे, और इनमें से 73.68% (14/19) अत्यधिक दवा-प्रतिरोधी (XDR) पाए गए। हमीरपुर जिले में 2018 तक मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंट तपेदिक (MDR-TB) के 94 मामले दर्ज किए गए थे, जिनमें से 25 मरीज अभी भी उपचाराधीन हैं। MDR बैक्टीरिया के संक्रमणों का उपचार कठिन होता है और यह रोगियों पर आर्थिक बोझ डालता है। पर्यावरण विभिन्न दवा-प्रतिरोधी जीनों का स्रोत हो सकता है, जो बैक्टीरिया को सुपरबग्स के रूप में उभरने में मदद करते हैं।