#धर्म
August 13, 2026
हिमाचल : 12 साल बाद भाई जमलू देवता से मिलने पहुंचे राजा घेपन, 272 KM पैदल चली देव यात्रा
जैसे ही देवी-देवताओं का मिलन हुआ, पूरा क्षेत्र पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुनों से गूंज उठा
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लाहौल। हिमाचल की ऊंची पहाड़ियों में इन दिनों सिर्फ इंसानों की आवाजाही नहीं, बल्कि आस्था की एक ऐसी ऐतिहासिक यात्रा भी चल रही है, जिसका इंतजार पूरे 12 साल तक किया जाता है।
लाहुल-स्पीति के आराध्य देव राजा घेपन अपने देव काफिले और देवलुओं के साथ लंबी धार्मिक परिक्रमा पर निकले हैं। दुर्गम पहाड़ी रास्तों, नालों और खतरनाक पुलियों को पार करता हुआ यह देव काफिला अब वापसी के सफर में रोहतांग के समीप पर्यटन स्थल मढ़ी पहुंच गया है।
राजा घेपन हर 12 वर्ष बाद अपनी परिक्रमा यात्रा पर निकलते हैं। इस बार भी देवता के साथ बड़ी संख्या में देवलू और श्रद्धालु इस धार्मिक यात्रा का हिस्सा बने। 25 जुलाई को लाहुल के शाशेन स्थित राजा घेपन के देवालय से यात्रा शुरू हुई थी।

देव काफिले ने कठिन पहाड़ी रास्तों से होते हुए मलाणा तक का सफर किया, जहां राजा घेपन का अपने भाई जमलू देवता से मिलन हुआ। इस धार्मिक यात्रा में देवलुओं ने करीब 272 किलोमीटर की दूरी तय की। यात्रा के दौरान कई ऐसे दुर्गम रास्ते आए, जहां आधुनिक सुविधाओं का सहारा लेना भी आसान नहीं था।
बुधवार को पलचान में राजा घेपन का देवता दानी, माता हिडिंबा और अठारह नाग देवताओं के साथ भव्य देव मिलन हुआ। जैसे ही देवी-देवताओं का मिलन हुआ, पूरा क्षेत्र पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुनों से गूंज उठा।

ढोल-नगाड़ों और रणसिंहों की आवाज के बीच श्रद्धालुओं ने इस ऐतिहासिक क्षण के दर्शन किए। ग्रामीणों की ओर से देवलुओं के लिए देव भोज का भी आयोजन किया गया। देव मिलन के बाद राजा घेपन का काफिला अपने अगले पड़ाव की ओर रवाना हुआ।
देव काफिले की वापसी यात्रा भी किसी चुनौती से कम नहीं है। राहला और मढ़ी के बीच देवलुओं को खतरनाक पैदल पुलिया पार करनी पड़ी। इसके अलावा रास्ते में नाले भी आए, जिन्हें देव काफिले ने पार किया। दुर्गम पहाड़ी पगडंडियों और प्राकृतिक बाधाओं के बीच देवलुओं का यह सफर हिमाचल की सदियों पुरानी देव परंपरा और स्थानीय आस्था की गहरी जड़ों को दर्शाता है।

देव प्रतिनिधि सुंदर ठाकुर और माता हिडिंबा के पुजारी राजेश व अनुज ने बताया कि धार्मिक काफिला बुधवार को मढ़ी पहुंच गया है। अब वीरवार को राजा घेपन का काफिला रोहतांग दर्रा पार कर कोकसर पहुंचेगा।
राजा घेपन की यह 12 वर्ष बाद होने वाली परिक्रमा सिर्फ धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि लाहुल-स्पीति की समृद्ध देव संस्कृति, परंपरा और सामुदायिक आस्था का जीवंत स्वरूप है। कठिन रास्तों के बावजूद देवलुओं का उत्साह और श्रद्धालुओं की आस्था इस पूरी यात्रा को खास बना रही है।