#विविध
August 13, 2026
हिमाचल में हर महीने 68 लोग गंवा रहे जा..न- विवाद, बीमारी और शादी बनी वजह
सिर्फ आंकड़े नहीं, समाज के लिए चेतावनी है ये रिपोर्ट
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शिमला। हिमाचल प्रदेश में आत्महत्या के मामलों में भले ही सालाना आंकड़े में मामूली गिरावट दर्ज हुई हो, लेकिन तस्वीर अब भी बेहद चिंताजनक बनी हुई है। प्रदेश में लगातार दूसरे साल 800 से अधिक लोगों ने आत्महत्या की। वर्ष 2023 में जहां 818 मामले दर्ज हुए थे, वहीं 2024 में यह संख्या 813 रही। यानी एक साल में सिर्फ पांच मामलों की कमी आई। प्रतिशत के लिहाज से यह गिरावट महज 0.6 फीसदी रही है।
आंकड़ों को अगर रोजाना और मासिक स्तर पर देखें तो स्थिति की गंभीरता और साफ नजर आती है। वर्ष 2024 में सामने आए 813 मामलों के हिसाब से प्रदेश में औसतन हर महीने करीब 68 और हर दिन दो से अधिक मामले दर्ज हुए। पारिवारिक विवाद, बीमारी और वैवाहिक या शादी से जुड़ी परेशानियां इसके प्रमुख कारणों में शामिल बताई गई हैं।
हिमाचल जैसे छोटे राज्य में हर साल 800 से अधिक लोगों की आत्महत्या सामाजिक स्तर पर गंभीर चिंता का विषय है। वर्ष 2023 में 818 मामले दर्ज हुए थे। 2024 में यह संख्या घटकर 813 हो गई। यानी आंकड़ों में कमी जरूर आई, लेकिन यह इतनी मामूली है कि स्थिति में किसी बड़े बदलाव का संकेत नहीं देती।
विशेषज्ञों के लिहाज से ऐसे आंकड़े केवल कानून-व्यवस्था या स्वास्थ्य से जुड़ा विषय नहीं हैं, बल्कि परिवार, सामाजिक सहयोग और मानसिक स्वास्थ्य से भी जुड़े व्यापक मुद्दे की ओर इशारा करते हैं।
राज्यवार आंकड़ों में हिमाचल के पड़ोसी राज्यों में भी मामलों में अलग-अलग बदलाव देखने को मिला। हरियाणा में 2023 के 3,361 मामलों के मुकाबले 2024 में 3,360 मामले दर्ज हुए। पंजाब में यह संख्या 2,298 से घटकर 2,229 और राजस्थान में 5,552 से घटकर 5,530 रही।
छोटे राज्यों में आंकड़ों में अपेक्षाकृत ज्यादा उतार-चढ़ाव दर्ज हुआ। मणिपुर में मामले 25 से बढ़कर 42 हो गए, जबकि नागालैंड में 36 से घटकर 11 मामले रह गए। अरुणाचल प्रदेश में 128 से घटकर 93 और मेघालय में 220 से घटकर 200 मामले दर्ज हुए।
राज्यवार उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2023 में कुल 1,68,884 मामले दर्ज हुए थे, जबकि 2024 में कुल आंकड़ा करीब 1.69 लाख रहा। यानी राष्ट्रीय स्तर पर भी कोई बड़ी गिरावट देखने को नहीं मिली।
हिमाचल के आंकड़े भले ही पिछले साल की तुलना में मामूली सुधार दिखाते हों, लेकिन हर साल 800 से अधिक लोगों की जान जाना इस बात का संकेत है कि समस्या को केवल आंकड़ों की नजर से देखने के बजाय इसके सामाजिक और पारिवारिक कारणों पर गंभीरता से काम करने की जरूरत है। परिवारों में संवाद, समय पर भावनात्मक सहयोग और परेशानी से जूझ रहे लोगों तक मदद पहुंचाना इस दिशा में अहम कदम हो सकते हैं।