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April 6, 2026

हिमाचल में 90 साल बाद निभाई गई देव परंपरा : तीसरी पीढ़ी बनी साक्षी, देवता ने दिया आशीर्वाद

यात्रा में उमड़ी भारी भीड़, देवता से लिया आशीर्वाद

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शिमला। देवभूमि हिमाचल प्रदेश की पहचान सदियों से जीवित देव परंपराओं से भी होती है। पहाड़ों के बीच बसे गांवों में आज भी ऐसे धार्मिक अनुष्ठान और रीति-रिवाज निभाए जाते हैं- जो न सिर्फ आस्था का केंद्र हैं, बल्कि एकता और सांस्कृतिक पहचान को भी मजबूत करते हैं।

90 साल बाद लौटी आस्था की अनूठी परंपरा

इन्हीं परंपराओं में एक अनोखी और दुर्लभ परंपरा सामने आई है- जो तीन पीढ़ियों के बाद निभाई जाती है और जिसका इंतजार दशकों तक किया जाता है। राजधानी शिमला के ठियोग क्षेत्र की मधान रियासत में करीब 90 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद “जातर” का आयोजन शुरू हुआ है।

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1936 के बाद अब...

इससे पहले यह आयोजन वर्ष 1936 में हुआ था। इतने लंबे समय बाद इस परंपरा का पुनर्जीवित होना स्थानीय लोगों के लिए किसी उत्सव से कम नहीं है। यह जातर सिर्फ एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि रियासत की परंपराओं, इतिहास और देव आस्था का जीवंत उदाहरण है। यहां आज भी राजा (राणा) और प्रजा के बीच संबंध आधुनिक कानूनों से अधिक देव मान्यताओं और परंपराओं के आधार पर निभाए जाते हैं।

 

Kalu Nag Devta Ji Maharaj Jatar Celebrated in Theog

क्यों होती है जातर?

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, जब भी रियासत में कोई बड़ा परिवर्तन होता है। जैसे राणा का राज्याभिषेक या वंश वृद्धि में बाधा तब क्षेत्र के आराध्य देवता कालू नाग देवता से आशीर्वाद लेकर जातर का आयोजन किया जाता है।

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क्या है इसका महत्व?

इस दौरान देवता अपने रथ में सवार होकर पूरे देव क्षेत्र का भ्रमण करते हैं। इसे देव सीमाओं को पुनः स्थापित करने और पूरे क्षेत्र को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देने का प्रतीक माना जाता है।

तीन पीढ़ियों बाद निभाई जाने वाली परंपरा

इस जातर की सबसे खास बात यह है कि इसे हर वर्ष नहीं, बल्कि विशेष परिस्थितियों और कई बार तीन पीढ़ियों के अंतराल के बाद ही आयोजित किया जाता है। यही कारण है कि इस आयोजन का महत्व और भी बढ़ जाता है।

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कारदारों के अनुसार, हाल ही में रियासत के राणा का देव परंपरा के अनुसार राज्याभिषेक हुआ था, लेकिन कुछ कारणों से जातर नहीं हो पाई। अब देव आज्ञा मिलने के बाद इस आयोजन की शुरुआत की गई है।

 

Kalu Nag Devta Ji Maharaj Jatar Celebrated in Theog

तीन देवठियों से जुड़ी आस्था

कालू नाग देवता की तीन प्रमुख देवठियां मानी जाती हैं-धार कंदरू, जदून और भराना। जातर के दौरान जदून से देवता का रथ निकलता है, जबकि धार कंदरू से पालकी लाई जाती है।

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पूरे क्षेत्र का भ्रमण करते हैं देवता

इसके बाद देवता गद्दी पर विराजमान होते हैं और पूरे क्षेत्र का भ्रमण करते हैं। यह क्षेत्र क्यारा से क्यारी तक फैला हुआ माना जाता है, जिसमें वर्तमान में 10 से 12 पंचायतें शामिल हैं।

 

Kalu Nag Devta Ji Maharaj Jatar Celebrated in Theog

देवता के साथ निकलती है जातर

इस जातर की एक और विशेषता यह है कि इसमें बथीनलू देवता की भी अहम भूमिका होती है। मान्यता है कि इस क्षेत्र पर पहले बथीनलू देवता का अधिकार था, बाद में कालू नाग देवता ने इसे अपने अधीन किया।

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इसके बावजूद, जातर का पहला अधिकार बथीनलू देवता को ही दिया गया है और आज भी दोनों देवता एक साथ इस यात्रा में शामिल होते हैं। यह परंपरा आपसी सम्मान और संतुलन का प्रतीक मानी जाती है।

 

Kalu Nag Devta Ji Maharaj Jatar Celebrated in Theog

पारंपरिक वेशभूषा में देवलुओं का नृत्य

जातर के दौरान देवता के साथ आए देवलु पारंपरिक वेशभूषा में विशेष नृत्य करते हैं। यह नृत्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि देव आराधना का हिस्सा होता है। एक रोचक मान्यता यह भी है कि जब तक देवता रथ में विराजमान होकर नृत्य कर रहे होते हैं, तब तक महिलाएं नृत्य नहीं करतीं। 

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लोगों में दिखा भारी उत्साह

जैसे ही रथ को निर्धारित स्थान पर स्थापित किया जाता है, महिलाएं भी श्रद्धा के साथ इस उत्सव में शामिल हो जाती हैं। करीब नौ दशक बाद हो रहे इस आयोजन को लेकर पूरे क्षेत्र में खासा उत्साह देखने को मिल रहा है। ग्रामीण इसे अपने इतिहास और संस्कृति से जुड़ने का अवसर मान रहे हैं।

 

Kalu Nag Devta Ji Maharaj Jatar Celebrated in Theog

संस्कृति और भाईचारे का प्रतीक

स्थानीय लोगों का कहना है कि यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और परंपराओं से जोड़ने का माध्यम भी है। यह जातर न सिर्फ देव आस्था का प्रतीक है, बल्कि समाज में भाईचारे, एकता और पारंपरिक मूल्यों को भी मजबूत करती है। देव स्थानों की शुद्धता बनाए रखने और सामूहिक सहभागिता की यह परंपरा आज के समय में भी उतनी ही प्रासंगिक है।

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