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April 6, 2026

हिमाचल की पंचायतें खर्च नहीं कर पाई 150 करोड़ : सरकार ने वापस मांगा पूरा पैसा

बजट खर्च न होने पर सरकार ने लिया बड़ा फैसला

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शिमला। हिमाचल प्रदेश की सुक्खू सरकार ने पंचायतों को दिए बजट का खर्च न होने पर एक बड़ा फैसला लिया है। ग्रामीण स्तर पर पेयजल व्यवस्थाओं को सुधारने के लिए दिया गया करोड़ों रुपये का बजट अब पंचायतों के हाथ से निकलकर सीधे विभाग के पास पहुंच गया है।

पंचायतें खर्च ही नहीं कर पाई 150 करोड़

यह बजट मुख्य रूप से गांवों में पानी की स्कीमों की मरम्मत और उनके रखरखाव के लिए दिया गया था- ताकि लोगों को नियमित और स्वच्छ पेयजल मिल सके। मगर तय समयसीमा तक पंचायतों द्वारा इस राशि का उपयोग न किए जाने के कारण सरकार ने इसे वापस लेकर जल शक्ति विभाग को सौंप दिया है।

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सरकार ने वापस मांगा सारा पैसा

राज्य सरकार का कहना है कि अगर यह बजट समय पर खर्च नहीं होता, तो यह लैप्स हो सकता था। ऐसे में विकास कार्यों को नुकसान होता। इसलिए यह फैसला लिया गया कि पैसा विभाग को देकर काम को तेजी से पूरा कराया जाए।

क्यों खर्च नहीं कर पाईं पंचायतें?

पंचायती राज मंत्री अनिरुद्ध सिंह के मुताबिक, केंद्र सरकार की मंशा है कि यह पैसा पंचायतें खुद खर्च करें। मगर जमीनी स्तर पर स्टाफ की भारी कमी के चलते पंचायतें इस जिम्मेदारी को निभाने में असमर्थ साबित हो रही हैं। उन्होंने साफ किया कि विभाग अब योजनाएं बनाएगा और उन्हें अमलीजामा पहनाएगा।

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अब विभाग करेगा काम

नई व्यवस्था के तहत जल शक्ति विभाग पानी की स्कीमों की मरम्मत और सुधार का काम करेगा। हालांकि, योजनाओं के पूरी तरह दुरुस्त हो जाने के बाद इनका संचालन और रखरखाव फिर से पंचायतों को सौंप दिया जाएगा। पंचायतों को यह भी अधिकार दिया गया है कि वे इन योजनाओं के संचालन के लिए स्थानीय लोगों से तय शुल्क वसूल सकें, जिससे रखरखाव का खर्च निकाला जा सके।

 

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पंचायतों ने लौटाया पैसा

सरकार द्वारा 31 मार्च तक सभी पंचायती राज संस्थाओं को यह बजट वापस करने के निर्देश दिए गए थे। जानकारी के अनुसार, अधिकांश पंचायतों, जिला परिषदों और पंचायत समितियों ने यह राशि विभाग को लौटा दी है। हालांकि, कुछ संस्थाओं से अब भी पैसा वापस नहीं आया है, जिस पर प्रशासन की नजर बनी हुई है।

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कब मिला था बजट?

यह पूरा फंड 15वें वित्त आयोग के तहत पंचायतों को दिया गया था। इसका उद्देश्य ग्रामीण इलाकों में बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करना था, खासकर पेयजल जैसी जरूरी सेवाओं को।

मामला पहुंचा उच्च न्यायालय तक

इस फैसले को लेकर अब विरोध भी सामने आने लगा है। शिमला जिले के केलवी वार्ड से जुड़े रहे जिला परिषद सदस्य मदन लाल वर्मा ने इस मुद्दे को गंभीर बताते हुए हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर हस्तक्षेप की मांग की है।

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मामले में दखल ना देने की गुहार

उन्होंने सरकार के इस आदेश को वापस लेने की अपील की है और इससे पहले मुख्य सचिव और पंचायती राज सचिव को भी पत्र लिख चुके हैं। साथ ही उन्होंने केंद्र सरकार के पंचायती राज एवं ग्रामीण विकास मंत्रालय से भी इस मामले में दखल देने की गुहार लगाई है।

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