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November 2, 2026

देवभूमि का ऐसा 'वाद्य यंत्र' जिसे बजाने से दूर भाग जाती हैं बुरी शक्तियां, द्वापर युग से जुड़ा है इसका इतिहास

पीएम मोदी से लेकर राष्ट्रपति तक को किया जा चुका है भेंट

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शिमला। देवभूमि कहे जाने वाले हिमाचल प्रदेश की पहचान केवल बर्फ से ढके पहाड़ों और खूबसूरत वादियों तक सीमित नहीं है। यह प्रदेश अपनी समृद्ध देव संस्कृति, सैकड़ों प्राचीन मंदिरों, लोक परंपराओं और सदियों पुरानी मान्यताओं के लिए भी देश-दुनिया में विशेष पहचान रखता है। हिमाचल के मंदिरों और देवी-देवताओं से जुड़ी परंपराएं आज भी उस प्राचीन लोक संस्कृति और आस्था को जीवंत रखे हुए हैं, जो पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती आ रही है।

 

देवभूमि के मंदिरों में होने वाले धार्मिक अनुष्ठान हों, देवी-देवताओं की यात्राएं हों या फिर देव मेलों का आयोजन, हर जगह भगवान के साथ चलने वाले ढोल, नगाड़े और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की अपनी अलग ही भूमिका और महत्ता है। इन वाद्य यंत्रों की गूंज केवल संगीत नहीं, बल्कि हिमाचल की पुरानी संस्कृति और देव परंपराओं की पहचान है।

 

इन्हीं पारंपरिक वाद्य यंत्रों में एक खास नाम है नरसिंघा, जिसे कई क्षेत्रों में रणसिंघा भी कहा जाता है। अपनी अनोखी बनावट और दूर तक गूंजने वाली आवाज के कारण यह वाद्य यंत्र हिमाचल की देव संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बना हुआ है। खास बात यह है कि नरसिंघे या रणसिंघे की परंपरा को महाभारत काल और प्राचीन युद्ध परंपराओं से भी जोड़कर देखा जाता है।

देवताओं की यात्रा में गूंजता है नरसिंघा

हिमाचल प्रदेश में देवी-देवताओं की परंपरा सदियों पुरानी है। कुल्लू, मंडी, शिमला, किन्नौर और प्रदेश के कई अन्य पहाड़ी क्षेत्रों में देव कार्यों के दौरान पारंपरिक वाद्य यंत्रों का विशेष महत्व रहता है। जब देवता अपने रथ के साथ मंदिर से बाहर निकलते हैं या किसी धार्मिक आयोजन के लिए यात्रा करते हैं, तो ढोल-नगाड़ों के साथ नरसिंघे की गूंज पूरे वातावरण को भक्तिमय बना देती है।

 

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स्थानीय लोगों के अनुसार देव कार्यों में बजने वाले पारंपरिक वाद्य यंत्र केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं। इनके साथ लोगों की गहरी धार्मिक आस्था और लोक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। ढोल की थाप और नरसिंघे की गूंज आज भी हिमाचल की उस पुरानी संस्कृति को सहेजे हुए है, जिसे आधुनिकता के दौर में भी लोग अपनी पहचान मानते हैं।

 

महाभारत की रणभूमि से जुड़ी है रणसिंघे की कहानी

नरसिंघे की परंपरा को लेकर कई ऐतिहासिक और लोक मान्यताएं प्रचलित हैं। साहित्यकारों और लोक संस्कृति के जानकारों के अनुसार इसका संबंध प्राचीन युद्ध परंपराओं से भी बताया जाता है। मान्यता है कि द्वापर युग में महाभारत के युद्ध के दौरान रणभूमि में युद्ध शुरू होने से पहले रणसिंघा बजाया जाता था। इसकी तेज और दूर तक पहुंचने वाली आवाज सैनिकों के लिए संकेत का काम करती थी। रणसिंघे की ध्वनि सुनकर योद्धाओं को युद्ध आरंभ होने की सूचना मिलती थी। इसी तरह सूर्यास्त के समय युद्ध समाप्त होने पर भी इसके माध्यम से युद्ध विराम का संकेत दिए जाने की परंपरा का उल्लेख किया जाता है।

 

इसी प्राचीन मान्यता और युद्ध से जुड़े उपयोग के कारण इसे रणसिंघा कहा गया। समय के साथ यह वाद्य यंत्र युद्धभूमि से निकलकर धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का हिस्सा बन गया। हिमाचल के पहाड़ी क्षेत्रों में इसे विशेष रूप से नरसिंघा के नाम से जाना जाता है।

 

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जीआई टैग से मिली नई पहचान

सदियों से हिमाचल की लोक संस्कृति का हिस्सा रहे इस पारंपरिक वाद्य यंत्र को अब नई पहचान मिली है। केंद्र सरकार की ओर से नरसिंघा को जीआई टैग मिलने के बाद इसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलने की उम्मीद बढ़ी है। कारीगरों का मानना है कि जीआई टैग मिलने से न केवल इस पारंपरिक कला का संरक्षण होगा, बल्कि इसे तैयार करने वाले स्थानीय शिल्पकारों के लिए भी नए अवसर पैदा होंगे। देश-विदेश में हिमाचली संस्कृति के प्रति बढ़ती रुचि से नरसिंघे की मांग में इजाफा हो सकता है। कारीगरों का कहना है कि यह केवल एक वाद्य यंत्र नहीं, बल्कि हिमाचल की सांस्कृतिक विरासत है। जीआई टैग मिलने से आने वाली पीढ़ियों को भी इस प्राचीन कला और इसे तैयार करने वाले कारीगरों के बारे में जानने का अवसर मिलेगा।

 

 

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हाथों से तैयार होता है सदियों पुराना वाद्य यंत्र

नरसिंघा तैयार करना बेहद मेहनत और बारीकी का काम है। इसे मुख्य रूप से तांबा, पीतल और चांदी जैसी धातुओं से बनाया जाता है। इसकी निर्माण प्रक्रिया आज भी काफी हद तक पारंपरिक तरीके से की जाती है। कारीगर पहले धातु के अलग-अलग हिस्सों को तैयार करते हैं। इसके बाद इन हिस्सों को विशेष तकनीक से जोड़कर नरसिंघे का अंतिम आकार दिया जाता है। बताया जाता है कि एक नरसिंघे को तैयार करने में करीब आठ अलग-अलग हिस्सों को जोड़ा जाता है। यह पूरा काम हाथों से किया जाता है और इसके लिए वर्षों के अनुभव की जरूरत होती है। एक बड़े आकार का नरसिंघा तैयार करने में करीब तीन से चार दिन तक का समय लग सकता है। इसकी बनावट जितनी महत्वपूर्ण है, उतनी ही अहम इसकी ध्वनि भी होती है। नरसिंघे से निकलने वाली आवाज प्रभावशाली और स्पष्ट हो, इसके लिए निर्माण के दौरान कारीगरों को विशेष सावधानी बरतनी पड़ती है।

 

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22 हजार से 60 हजार तक कीमत

नरसिंघे की कीमत उसके आकार, डिजाइन और इस्तेमाल की गई धातु के आधार पर तय होती है। बड़े आकार के नरसिंघे मुख्य रूप से देवी-देवताओं के धार्मिक आयोजनों और देव कार्यों के लिए खरीदे जाते हैं। इनकी कीमत करीब 22 हजार रुपये से लेकर 60 हजार रुपये तक हो सकती है। वहीं, बदलते समय के साथ छोटे आकार के सजावटी नरसिंघों की मांग भी बढ़ने लगी है। इन्हें आकर्षक तरीके से तैयार कर घरों, होटलों और अन्य स्थानों पर सजावट के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। छोटे सजावटी नरसिंघों की कीमत करीब 4 हजार से 15 हजार रुपये तक बताई जाती है।

देव परंपरा से निकलकर घरों की सजावट तक पहुंचा नरसिंघा

पहले नरसिंघे का उपयोग मुख्य रूप से मंदिरों और देवी-देवताओं से जुड़े धार्मिक आयोजनों तक ही सीमित था। लेकिन अब समय के साथ इसका बाजार भी बदल रहा है। हिमाचली संस्कृति से प्रेम करने वाले लोग इसे अपनी विरासत और पहचान के रूप में घरों में सजाकर रखने लगे हैं। पर्यटकों के बीच भी हिमाचल के पारंपरिक उत्पादों को लेकर आकर्षण बढ़ा है। इसी को देखते हुए कारीगर अब छोटे आकार के नरसिंघे तैयार कर रहे हैं, जिन्हें शीशे के फ्रेम में सजाया जाता है। कई उत्पादों में कुल्लवी पट्टी का इस्तेमाल कर उन्हें और आकर्षक बनाया जाता है। इससे पारंपरिक कारीगरों के लिए आय के नए रास्ते खुले हैं और एक पुरानी कला को आधुनिक बाजार से जोड़ने की कोशिश भी हो रही है।

 

 

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सराज क्षेत्र में सबसे अधिक होता है निर्माण

हिमाचल में नरसिंघा तैयार करने की कला विशेष रूप से मंडी जिले के सराज क्षेत्र में प्रचलित है। यहां कई परिवार पीढ़ियों से इस पारंपरिक कला से जुड़े हुए हैं। रोजगार के सिलसिले में सराज क्षेत्र के कुछ कारीगर कुल्लू में भी बस गए हैं और वहां भी इस कला को आगे बढ़ा रहे हैं। इसके अलावा चंबा और शिमला के कुछ क्षेत्रों में भी सीमित स्तर पर नरसिंघे का निर्माण किया जाता है। हालांकि, इस पारंपरिक कला को जीवित रखने वाले कुशल कारीगरों की संख्या सीमित होती जा रही है, जिससे इसके संरक्षण की जरूरत भी महसूस की जा रही है।

 

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लोक मान्यता: जहां तक गूंजे नरसिंघा, वहां नहीं आतीं नकारात्मक शक्तियां

हिमाचल की देव संस्कृति में नरसिंघे को लेकर कई लोक मान्यताएं भी प्रचलित हैं। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार नरसिंघे की धुन जहां तक पहुंचती है, वहां तक बुरी या नकारात्मक शक्तियां प्रवेश नहीं कर पातीं। इसी आस्था के चलते मंदिरों और देवी-देवताओं के धार्मिक आयोजनों में आज भी नरसिंघा बजाने की परंपरा कायम है। देव यात्राओं के दौरान ढोल की थाप, नगाड़ों की गूंज और नरसिंघे की प्रभावशाली आवाज एक ऐसा वातावरण तैयार करती है, जिसमें हिमाचल की सदियों पुरानी संस्कृति और आस्था एक साथ दिखाई देती है।

 

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वीवीआईपी मेहमानों को भी भेंट किया जा चुका है नरसिंघा

हिमाचल की सांस्कृतिक पहचान बन चुके नरसिंघे को विशेष मेहमानों और वीवीआईपी हस्तियों को भी उपहार के रूप में भेंट किया जाता रहा है। यह वाद्य यंत्र केवल एक हस्तशिल्प उत्पाद नहीं, बल्कि हिमाचल की देव संस्कृति और लोक परंपराओं का प्रतीक बन चुका है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के मनाली दौरे के दौरान उन्हें नरसिंघा भेंट किया गया था। वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी हिमाचल दौरे के दौरान यह पारंपरिक वाद्य यंत्र उपहार के रूप में दिया जा चुका है। इससे इस प्राचीन कला को राष्ट्रीय स्तर पर भी विशेष पहचान मिली है।

आधुनिक दौर में भी जिंदा है सदियों पुरानी विरासत

तेजी से बदलते आधुनिक दौर में जहां कई पारंपरिक कलाएं और लोक वाद्य यंत्र धीरे-धीरे गायब हो रहे हैं, वहीं हिमाचल का नरसिंघा आज भी अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। मंदिरों में देवताओं के साथ चलने वाले ढोल और पारंपरिक वाद्य यंत्र प्रदेश की संस्कृति को आज भी सहेजे हुए हैं।

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