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June 26, 2026

देवभूमि हिमाचल का इकलौता ऐसा मेला- जहां खाने-पीने के लिए नहीं खर्च होता एक भी रुपया

मां शूलिनी से जुड़ी है सोलन की आस्था और परंपरा

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himachal Maa Shoolini

सोलन। देश और प्रदेश में लगने वाले कई मेलों में लोगों को खाने-पीने के लिए पैसे खर्च करने पड़ते हैं, लेकिन देवभूमि हिमाचल में एक ऐसा अनोखा मेला भी लगता है, जहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं को भोजन की कोई चिंता नहीं रहती। सोलन जिले का प्रसिद्ध मां शूलिनी मेला धार्मिक आस्था के साथ-साथ सेवा, संस्कार और भाईचारे की मिसाल भी पेश करता है। तीन दिनों तक चलने वाले इस मेले में शहरभर में जगह-जगह भंडारे लगाए जाते हैं, जहां हर आने वाले व्यक्ति को सम्मान के साथ भोजन कराया जाता है। यही खासियत मां शूलिनी मेले को बाकी मेलों से अलग पहचान दिलाती है।

मां शूलिनी से जुड़ी है सोलन की आस्था और परंपरा

मां शूलिनी को सोलन शहर की आराध्य देवी माना जाता है। मान्यता है कि मां शूलिनी बघाट रियासत के राजाओं की कुल देवी थीं और उन्हीं के नाम पर सोलन शहर का नाम पड़ा। मेले के दौरान मां शूलिनी की पालकी मंदिर से निकलकर पूरे शहर की परिक्रमा करती है और अपनी बड़ी बहन मां दुर्गा के मंदिर पहुंचती है। यहां माता तीन दिनों तक विराजमान रहकर भक्तों को दर्शन देती हैं।

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मां शूलिनी की कृपा पर अटूट विश्वास

स्थानीय लोगों का विश्वास है कि मां शूलिनी की कृपा हमेशा सोलन शहर पर बनी रहती है। कहा जाता है कि जब तक माता प्रसन्न रहती हैं, तब तक शहर को किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा या महामारी का सामना नहीं करना पड़ता। यही आस्था आज भी हजारों लोगों को मां के दरबार तक खींच लाती है।

सोलन की पहचान बन चुका शूलिनी मेला 

हर साल जून महीने के तीसरे सप्ताह में सोलन में लगने वाला राज्यस्तरीय शूलिनी मेला सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि पूरे शहर की पहचान बन चुका है। तीन दिन तक चलने वाले इस मेले में हिमाचल प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से लोग मां के दर्शन करने और इस ऐतिहासिक परंपरा का हिस्सा बनने पहुंचते हैं।

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दो बहनों के मिलन से शुरू होता है मेला

मेले की शुरुआत एक बेहद खास परंपरा के साथ होती है। पहले दिन मां शूलिनी की पालकी को पूरे विधि-विधान के साथ उनके मुख्य मंदिर से बाहर निकाला जाता है। इसके बाद माता की पालकी पूरे शहर की परिक्रमा करती हुई गंज बाजार स्थित अपनी बड़ी बहन मां दुर्गा के मंदिर पहुंचती है। दो बहनों के इस मिलन को देखने के लिए हजारों श्रद्धालु सड़कों पर उमड़ पड़ते हैं। यही परंपरा शूलिनी मेले को सबसे अलग और खास बनाती है।

दूर-दूर से आते हैं श्रद्धालु 

माना जाता है कि माता अपनी बड़ी बहन से मिलने के बाद अगले तीन दिनों तक वहीं विराजमान रहती हैं और भक्तों को आशीर्वाद देती हैं। इस दौरान मंदिर परिसर में पूजा-अर्चना का दौर चलता रहता है और दूर-दूर से आए श्रद्धालु माता के दर्शन कर अपनी मनोकामनाएं मांगते हैं। 

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200 साल पुरानी सेवा परंपरा

मां शूलिनी मंदिर की सेवा से जुड़ा एक परिवार पिछले करीब 200 सालों से माता की पूजा-अर्चना करता आ रहा है। मंदिर के पुजारी रामस्वरूप शर्मा का परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी माता की सेवा में लगा हुआ है। यह परंपरा आज भी उसी श्रद्धा और विश्वास के साथ निभाई जा रही है।

एक दिन का होता था मेला

पहले शूलिनी मेला बहुत छोटा हुआ करता था और इसका आयोजन केवल एक दिन के लिए होता था, लेकिन समय के साथ यह एक बड़े उत्सव में बदल गया। आज यह मेला करोड़ों रुपये के बजट वाला राज्यस्तरीय आयोजन बन चुका है। मेले में होने वाली सांस्कृतिक संध्याएं, लोक कलाकारों की प्रस्तुतियां और कार्यक्रम पूरे हिमाचल में अपनी अलग पहचान रखते हैं।

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जगह-जगह लगाए जाते हैं भंडारे

इस मेले की सबसे बड़ी खूबसूरती यहां के लोगों का अपनापन और सेवा भावना है। तीन दिनों तक पूरा सोलन शहर मेहमानों और श्रद्धालुओं के स्वागत में जुट जाता है। जगह-जगह भंडारे लगाए जाते हैं, जहां लोगों को बिना किसी भेदभाव के खाना खिलाया जाता है। आइसक्रीम, खीर, पूड़े और कई तरह के पकवान श्रद्धालुओं को मुफ्त में बांटे जाते हैं।

26 से 28 जून चलेगा मेला 

यही वजह है कि शूलिनी मेला केवल पूजा और परंपरा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हिमाचली संस्कृति, भाईचारे और मिल-जुलकर रहने की भावना को भी दिखाता है। यहां आने वाला हर व्यक्ति अपने साथ माता का आशीर्वाद और सोलन की यादें लेकर जाता है। इस बार 26 से 28 जून तक सोलन में शूलिनी मेले का आयोजन किया जा रहा है। प्रशासन की देखरेख में सजने वाला यह मेला एक बार फिर लोगों को अपनी पुरानी परंपराओं और संस्कृति से जोड़ेगा।

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