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June 26, 2026

हिमाचल बूढ़ाकेदार तीर्थ में गूंजे हर-हर महादेव के जयकारे, निर्जला एकादशी पर उमड़े हजारों श्रद्धालु

शिवलिंग के रूप में विराजमान भगवान शिव

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himachal mandi  Boodha Kedar Temple

मंडी। हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले की सराज घाटी में स्थित प्रसिद्ध धार्मिक स्थल बूढ़ाकेदार तीर्थ में ज्येष्ठ माह की निर्जला एकादशी के अवसर पर हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। ऊंचाई वाले बर्फीले क्षेत्र में होने के बावजूद दूर-दूर से श्रद्धालु यहां पहुंचे और पवित्र जल में स्नान कर भगवान शिव का आशीर्वाद लिया। इस दौरान पूरा क्षेत्र भक्तिमय माहौल में डूबा नजर आया।

शरीर और मन दोनों की होती है शुद्धि 

माता शिकारी देवी के आंचल में बसे इस पवित्र तीर्थ की अपनी अलग पहचान है। बूढ़ाकेदार को सिर्फ इंसानों की आस्था का केंद्र ही नहीं माना जाता, बल्कि यहां सराज घाटी के साथ-साथ जिला कुल्लू और मंडी के कई स्थानीय देवी-देवता भी विशेष अवसरों पर स्नान करने आते हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि यहां आकर स्नान करने से शरीर और मन दोनों की शुद्धि होती है।

 

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शिवलिंग के रूप में विराजमान भगवान शिव

मंदिर के पुजारी जोत राम शर्मा ने बताया कि उत्तराखंड के पंच केदारों की तरह बूढ़ाकेदार का भी धार्मिक महत्व बहुत अधिक है। मान्यता है कि भगवान शिव इस स्थान पर प्राकृतिक गुफा के अंदर शिवलिंग के रूप में विराजमान हैं। यहां का वातावरण और धार्मिक मान्यताएं श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। 

पांडवों से जुड़ी है प्राचीन मान्यता

बूढ़ाकेदार तीर्थ को लेकर एक पुरानी कथा भी प्रचलित है। मान्यता के अनुसार महाभारत युद्ध के बाद पांडवों पर अपने ही रिश्तेदारों की हत्या का दोष लगा था। इस दोष से मुक्ति पाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण की सलाह पर पांडव भगवान शिव की आराधना करने निकले।  

 

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पापों से मिलती हाँ मुक्ति 

कहा जाता है कि जब पांडव भगवान शिव की तलाश करते हुए इस क्षेत्र में पहुंचे तो भगवान शिव वहां से अंतर्ध्यान हो गए। इसी दौरान नंदी ने भी अपना रूप बदलकर धरती में समा लिया। इसके बाद पांडवों ने इस पवित्र स्थान पर स्नान और पूजा-अर्चना की, जिसके बाद उन्हें अपने पापों से मुक्ति मिली।

चारधाम यात्रा के बाद बूढ़ाकेदार आने की मान्यता

बूढ़ाकेदार में आज भी एक करीब 18 फुट गहरा ऐतिहासिक कुआं मौजूद है। स्थानीय लोगों के अनुसार इस कुएं के पानी को बहुत पवित्र माना जाता है। यहां के पानी से एक अलग तरह की सुगंध आने की बात भी कही जाती है।

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भक्तों की पूरी होती है मनोकामनाएं 

स्थानीय निवासी लोगों का कहना है कि कई श्रद्धालु चारधाम यात्रा पूरी करने के बाद बूढ़ाकेदार आकर स्नान करते हैं। लोगों की मान्यता है कि इसके बाद ही उनकी यात्रा पूरी मानी जाती है। इसके अलावा माता शिकारी देवी के दर्शन करने से भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होने की भी आस्था जुड़ी हुई है।

स्नान करने आते है देवता

निर्जला एकादशी जैसे विशेष अवसरों पर सराज क्षेत्र के आराध्य देवता, मगरू महादेव सहित अन्य देवी-देवता भी बूढ़ाकेदार पहुंचकर शाही स्नान करते हैं। यह परंपरा इस तीर्थ की खास पहचान मानी जाती है।

 

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छह महीने बर्फ में बंद रहता है रास्ता

बूढ़ाकेदार तीर्थ ऊंचाई वाले इलाके में स्थित है, जिसके कारण सर्दियों में यहां पहुंचना काफी मुश्किल हो जाता है। भारी बर्फबारी के चलते नवंबर से अप्रैल तक यह मार्ग पूरी तरह बंद रहता है। मौसम खुलने के बाद ही श्रद्धालुओं के लिए रास्ता दोबारा खुलता है।

बाहरी राज्यों से भी आते हैं श्रद्धालु

गर्मी के मौसम में यहां हिमाचल प्रदेश के अलावा पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और दिल्ली से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। लोग यहां भगवान शिव की पूजा, साधना और आशीर्वाद लेने के लिए आते हैं। प्राकृतिक सुंदरता और धार्मिक महत्व के कारण बूढ़ाकेदार तीर्थ सराज घाटी की एक खास पहचान बन चुका है।

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