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October 19, 2026

हिमाचल में यहां नहीं जल**ता रावण का पुतला, दशहरा मनाने से भी बचते हैं लोग ; जानिए वजह

70 के दशक में शुरू हुआ था दशहरा, फिर बंद हो गया

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Baijnath Dussehra Baijnath Shiva Temple news 2026

कांगड़ा/चंबा। आज पूरे देश में दशहरा उत्सव मनाया जा रहा है। लोग बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मना रहे हैं और जगह-जगह रावण के पुतले जलाए जाएंगे। लेकिन हिमाचल प्रदेश में कुछ ऐसी जगहें भी हैं, जहां दशहरा मनाना शुभ नहीं माना जाता। इनमें बैजनाथ और चंबा का भरमौर शामिल है।

बैजनाथ में दशहरा मनाने से क्यों बचते हैं लोग?

कांगड़ा जिले का बैजनाथ भगवान शिव के प्रसिद्ध मंदिर के लिए जाना जाता है। मान्यता है कि रावण ने यहां भगवान शिव की तपस्या की थी। इसी वजह से बैजनाथ में दशहरा मनाने और रावण का पुतला जलाने की परंपरा नहीं है। लोगों के बीच इसे लेकर कई तरह की धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं।

 

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70 के दशक में शुरू हुआ था दशहरा, फिर बंद हो गया

बताया जाता है कि 1970 के दशक में बैजनाथ के ऐतिहासिक शिव मंदिर के मैदान में दशहरा मनाने की शुरुआत हुई थी। उस समय रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले भी जलाए जाते थे। लेकिन आयोजन से जुड़े कुछ लोगों के साथ दुर्घटनाएं होने लगीं। इसके बाद लोगों ने दशहरा मनाना बंद कर दिया और धीरे-धीरे यह मान्यता बन गई कि बैजनाथ में रावण का पुतला जलाना ठीक नहीं है।

रावण ने बैजनाथ में की थी भगवान शिव की तपस्या

मान्यता के अनुसार रावण भगवान शिव का बहुत बड़ा भक्त था। उसने बैजनाथ में भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की थी। इसी वजह से बैजनाथ को धार्मिक रूप से बेहद खास माना जाता है। मंदिर से कुछ दूरी पर पपरोला जाने वाले रास्ते के पास रावण का मंदिर और उसके पैरों के निशान होने की भी मान्यता है।

 

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कैसे बैजनाथ में स्थापित हुआ शिवलिंग?

कहा जाता है कि रावण भगवान शिव को अपने साथ लंका ले जाना चाहता था। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे शिवलिंग दिया और कहा कि इसे रास्ते में कहीं जमीन पर न रखना। लंका जाते समय रावण बैजनाथ में रुका और एक गड़रिए को शिवलिंग पकड़ाकर कुछ देर के लिए चला गया।

 

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शिवलिंग बहुत भारी था। गड़रिए से उसे ज्यादा देर तक संभाला नहीं गया और उसने शिवलिंग को जमीन पर रख दिया। मान्यता है कि इसके बाद शिवलिंग वहीं स्थापित हो गया और आज यही स्थान बैजनाथ के प्रसिद्ध शिव मंदिर के रूप में जाना जाता है।

भरमौर में भी नहीं जलाया जाता रावण का पुतला

चंबा के भरमौर में भी दशहरे के दौरान रावण का पुतला नहीं जलाया जाता। यहां भी भगवान शिव और रावण से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं हैं। माना जाता है कि रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कैलाश पर्वत पर तपस्या की थी। भरमौर भी धार्मिक रूप से कैलाश क्षेत्र से जुड़ा हुआ है, इसलिए यहां रावण के पुतले का दहन नहीं किया जाता।

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दशमुखी शिला को माना जाता है रावण का स्वरूप

भरमौर के शाम चौरासी परिसर के पास अर्द्धगंगा कुंड और कपलेश्वर महादेव मंदिर है। इसी मंदिर के पास एक दशमुखी शिला भी है। स्थानीय मान्यता के अनुसार इसे रावण का स्वरूप माना जाता है।

1204 ई. में बना था बैजनाथ मंदिर

बैजनाथ का प्रसिद्ध शिव मंदिर नागर शैली में बना हुआ है। माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण वर्ष 1204 ई. में दो स्थानीय व्यापारियों ने करवाया था। मंदिर के गर्भगृह में शिवलिंग स्थापित है। इसकी दीवारों पर कई तरह की नक्काशी और चित्र बने हुए हैं। मंदिर के मुख्य कक्ष में दो शिलालेख भी हैं, जिनमें से एक संस्कृत और दूसरा टांकरी भाषा में लिखा हुआ है।

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