#राजनीति
May 8, 2026
सीएम सुक्खू के पूर्व CPS ने अब तक खाली नहीं किए सरकारी आवास, हाईकोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब
हाईकोर्ट की सुक्खू सरकार को फटकार, मांगे सरकारी बंगले में बने रहने की अनुमति आदेश
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शिमला। हिमाचल प्रदेश में मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के कार्यकाल के दौरान नियुक्त किए गए छह मुख्य संसदीय सचिवों ;सीपीएसद्ध की कुर्सी छिनने के बाद सरकारी आवास खाली ना करने का मामला तूल पकड़ गया है। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए प्रदेश सरकार से जवाब तलब किया है और पूरे मामले पर तीखी टिप्पणी की है।
मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बी सी नेगी की खंडपीठ ने राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं कि वह 6 जून 2025 का वह आदेश अदालत के समक्ष पेश करे, जिसके आधार पर पूर्व सीपीएस को सरकारी आवासों में रहने की अनुमति दी गई। अदालत ने साफ किया कि बिना वैध आदेश के इस तरह आवासों पर कब्जा बनाए रखना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।
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मामले की सुनवाई के दौरान सरकार द्वारा दाखिल हलफनामे में स्वीकार किया गया कि छह पूर्व सीपीएस अब भी सरकारी आवासों में रह रहे हैं। चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि उनसे न तो कोई लाइसेंस शुल्क लिया जा रहा है और न ही उनके वेतन से किसी प्रकार की कटौती की जा रही है। सरकार ने यह व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट में लंबित विशेष अनुमति याचिका के अंतिम निर्णय से जोड़ दी है।
अदालत ने इस स्थिति पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने उनकी बर्खास्तगी पर कोई रोक नहीं लगाई है। केवल उनकी विधायकी से जुड़ा मुद्दा विचाराधीन है। ऐसे में बिना किसी शुल्क या वैधानिक आधार के सरकारी आवासों में रहना अधिकार से अधिक लगता है।
सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी सामने आया कि जिन सरकारी आवासों पर पूर्व सीपीएस कुंडली मारकर बैठे हैं, वे हाईकोर्ट परिसर के बेहद करीब स्थित हैं। अदालत ने चिंता व्यक्त की कि इन महत्वपूर्ण रिहायशी परिसरों का उपयोग उन न्यायाधीशों के आवंटन के लिए किया जा सकता है, जिन्हें वर्तमान में लंबी दूरी तय कर कोर्ट पहुंचना पड़ता है। हाईकोर्ट पहले भी न्यायाधीशों को उपयुक्त आवास न मिलने पर अपनी आपत्ति दर्ज करा चुका है। ऐसे में संवैधानिक पदों से हटाए गए व्यक्तियों द्वारा इन आवासों को खाली न करना न्यायपालिका के सुचारू कामकाज में भी बाधा उत्पन्न कर रहा है।
गौरतलब है कि हाईकोर्ट ने 13 नवंबर 2024 को सुक्खू सरकार द्वारा नियुक्त छह मुख्य संसदीय सचिवों की नियुक्तियों को असंवैधानिक घोषित करते हुए रद्द कर दिया था। कोर्ट ने वर्ष 2006 के सीपीएस एक्ट को ही निरस्त करते हुए आदेश दिया था कि इन सभी से सरकारी गाड़ियां, बंगले, वेतन और स्टाफ जैसी तमाम सुविधाएं तुरंत वापस ली जाएं
हालांकि इन आदेशों के बाद भी पूर्व सीपीएस ने सरकारी आवास खाली नहीं किए, जिससे अब यह मामला न्यायिक जांच के दायरे में आ गया है। जिन विधायकों को इस पद से हटाया गया था उनमें मोहन लाल ब्राक्टा, सुंदर सिंह ठाकुर, संजय अवस्थी, आशीष बुटेल, राम कुमार चौधरी और किशोरी लाल शामिल हैं।
राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन शीर्ष अदालत ने भी इन नियुक्तियों को असंवैधानिक माना। हालांकि विधायकी से जुड़ा मुद्दा अभी विचाराधीन है। इसके बावजूद सरकारी आवासों पर कब्जा जारी रहने से सरकार की भूमिका पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
अब हाईकोर्ट ने सरकार के विशेष सचिव को हलफनामा दायर कर यह बताने को कहा है कि नियुक्तियां रद्द होने के बाद से ये विधायक कितने समय से इन आवासों पर काबिज हैं। अदालत ने साफ लहजे में पूछा है कि क्या किसी भी पूर्व सीपीएस ने अपनी मर्जी से या नियम के तहत अब तक कोई शुल्क जमा किया है।
हाईकोर्ट की इस सख्ती ने सुक्खू सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं, क्योंकि एक तरफ कानून का पालन करने का दबाव है तो दूसरी तरफ अपनों को उपकृत करने की मजबूरी। आने वाले दिनों में यदि सरकार संतोषजनक रिकॉर्ड पेश नहीं कर पाती है, तो पूर्व सीपीएस को जबरन बंगले खाली करने के आदेश जारी हो सकते हैं।