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January 4, 2026
सुक्खू सरकार ने मंत्रियों के लिए ही नहीं... नेता प्रतिपक्ष के लिए भी खरीदी फॉर्च्यूनर गाड़ी; जानें क्यों
जयराम ठाकुर और तीन मंत्रियों के लिए खरीदीं फॉर्च्यूनर गाड़ियां
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शिमला। एक तरफ आर्थिक तंगी, खाली खजाने और संसाधनों की भारी कमी का हवाला देकर फैसलों को टालने और विभागों को खर्चों में कटौती के निर्देश देने वाली सुक्खू सरकार, दूसरी तरफ सत्ता के गलियारों में नई-नवेली चमचमाती लग्जरी गाड़ियों की चाबियां बांट रही है। हिमाचल की कांग्रेस सरकार की इस विरोधाभासी तस्वीर ने सियासी हलकों में तीखी चर्चा छेड़ दी है। सवाल उठने लगे हैं कि जब जनकल्याणकारी योजनाओं के लिए धन की कमी बताई जा रही है, तब मंत्रियों और नेता प्रतिपक्ष के लिए लाखों रुपये की महंगी गाड़ियों की खरीद आखिर किस आधार पर की जा रही है। आर्थिक संकट का हवाला देने वाली सरकार की प्राथमिकताओं पर अब गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
प्रदेश की आर्थिक हालत को लेकर बार.बार चेतावनी देने वाली सरकार ने नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर समेत तीन मंत्रियों कृषि मंत्री चंद्र कुमार, स्वास्थ्य मंत्री धनीराम शांडिल और बागवानी मंत्री जगत सिंह नेगी को नई फॉर्च्यूनर गाड़ियां उपलब्ध करवाई हैं। तर्क यह दिया गया कि इन नेताओं की पुरानी सरकारी गाड़ियां तय तीन लाख किलोमीटर की सीमा पूरी कर चुकी थीं, इसलिए इन्हें बदला जाना जरूरी था।
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हालांकि, सूत्र बताते हैं कि इन गाड़ियों की खरीद को लेकर सामान्य प्रशासन विभाग पहले काफी समय तक टालमटोल करता रहा। मामला मंत्रिमंडल की बैठक तक पहुंचा, जहां दबाव बनने के बाद आखिरकार खरीद को हरी झंडी दे दी गई। इसके बाद हाल ही में टॉप मॉडल फॉर्च्यूनर गाड़ियों की खरीद की गई, जिनकी कीमत प्रति वाहन 45 से 50 लाख रुपये के बीच बताई जा रही है।
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दिलचस्प बात यह है कि सरकार ने खुद के मंत्रियों के साथ.साथ नेता प्रतिपक्ष पर भी खास मेहरबानी दिखाई। विपक्ष के नेता जयराम ठाकुर को भी नई गाड़ी दी गई, जिस पर राजनीतिक हलकों में चर्चा शुरू हो गई है कि आर्थिक संकट के दौर में भी सत्ता और व्यवस्था से जुड़े चेहरों के लिए सुविधाओं में कोई कमी नहीं छोड़ी जा रही।
बताया जा रहा है कि विकल्प के तौर पर ई-कारें देने पर भी विचार हुआ था, लेकिन दुर्गम और पहाड़ी इलाकों की खराब सड़कों का हवाला देकर इस प्रस्ताव को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। आखिरकार डीजल से चलने वाली महंगी फॉर्च्यूनर गाड़ियों को ही उपयुक्त मानते हुए खरीद का फैसला लिया गया।
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इधर, सरकार के कई वरिष्ठ अधिकारी भी अपनी गाड़ियां बदलने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि उनकी कारें भी तय माइलेज पूरा कर चुकी हैं और अब मरम्मत कराना बेहद महंगा पड़ रहा है। लेकिन आर्थिक दबाव का हवाला देते हुए सामान्य प्रशासन विभाग फिलहाल अधिकारियों की मांगों को नजरअंदाज कर रहा है।