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April 3, 2026

हिमाचल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला- सिर्फ पहली ही नहीं दूसरी पत्नी भी होगी पेंशन की हकदार

पहली पत्नी के होते हुए की थी सरकारी कर्मी ने दूसरी शादी

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शिमला। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पारिवारिक पेंशन से जुड़े एक अहम मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कहा है कि केवल तकनीकी आधार पर किसी आश्रित को उसके अधिकार से वंचित करना न्यायसंगत नहीं है।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला एक सरकारी कर्मचारी की दूसरी पत्नी से जुड़ा है- जिसने अपने पति के निधन के बाद पारिवारिक पेंशन के लिए याचिका दायर की थी। इसी फैसले पर अब हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुनाया है।

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सरकारी कर्मी ने की थी दूसरी शादी

जानकारी के अनुसार, कर्मचारी ने दूसरी शादी उस समय की थी जब उसकी पहली पत्नी जीवित थी। हालांकि, पहली पत्नी की कोई संतान नहीं थी और वर्ष 2015 में उनका निधन हो गया था।

दूसरी पत्नी के साथ रह रहा था

इसके बाद कर्मचारी अपनी दूसरी पत्नी और दो बच्चों के साथ रह रहा था। वर्ष 2021 में कर्मचारी की मृत्यु के बाद दूसरी पत्नी ने पेंशन के लिए आवेदन किया। राज्य सरकार ने फरवरी 2022 में इस आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि दूसरी शादी उस समय हुई थी जब पहली पत्नी जीवित थी। इसलिए यह विवाह नियमों के अनुसार वैध नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर दूसरी पत्नी को पारिवारिक पेंशन देने से इनकार कर दिया गया।

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अदालत की सख्त टिप्पणी

मामले की सुनवाई करते हुए न्यायाधीश अजय मोहन गोयल ने सरकार के इस तर्क को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि पहली पत्नी की मृत्यु कर्मचारी के जीवनकाल में ही हो चुकी थी और उनका कोई वारिस भी नहीं था। ऐसे में पेंशन पर किसी अन्य व्यक्ति का दावा नहीं बनता।

दूसरी पत्नी का पेंशन पर हक

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर कोई पुरुष और महिला लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहते हैं, तो परिस्थितियों के आधार पर कानून उस संबंध को मान्यता दे सकता है। इस तरह के मामलों में केवल तकनीकी खामियों के आधार पर अधिकारों को नकारना न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।

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अदालत का फैसला और निर्देश

अदालत ने राज्य सरकार के पूर्व आदेश को निरस्त करते हुए संबंधित विभाग को तुरंत पारिवारिक पेंशन जारी करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने आदेश दिया कि याचिकाकर्ता को मई 2026 से नियमित मासिक पेंशन दी जाए।

3 महीने के अंदर मिलेगा पूरा पैसा

साथ ही, अदालत ने यह भी कहा कि अब तक की सभी बकाया पेंशन राशि तीन महीने के भीतर अदा की जाए। यदि विभाग तय समय सीमा के भीतर भुगतान नहीं करता है, तो उसे बकाया राशि पर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।

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अधिकारों से कर दिया जाता है वंचित

यह फैसला केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है। उन सभी मामलों के लिए महत्वपूर्ण है जहां पारिवारिक परिस्थितियां कठिन होती हैं और कानूनी तकनीकीताओं के चलते आश्रितों को उनके अधिकारों से वंचित कर दिया जाता है। अदालत ने अपने निर्णय में यह संदेश दिया है कि न्याय केवल नियमों का पालन भर नहीं, बल्कि परिस्थितियों और मानवीय पहलुओं को समझते हुए किया जाना चाहिए।

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