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February 26, 2026
मंत्री विक्रमादित्य के विभाग को कोर्ट का झटका: 3 विश्राम गृह-XEN ऑफिस कुर्क करने के दिए आदेश
सुक्खू सरकार को मुआवजा राशि देने में ढिलाई बरतनी पड़ी महंगी
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शिमला। हिमाचल प्रदेश की सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार के लिए कानूनी मोर्चे पर एक बड़ी फजीहत खड़ी हो गई है। रोहड़ू की एक अदालत ने एक ऐतिहासिक और कड़ा फैसला सुनाते हुए मंत्री विक्रमादित्य सिंह के लोक निर्माण विभाग (HPPWD) की संपत्तियों को कुर्क अचैट करने के आदेश जारी किए हैं। यह मामला सीधे तौर पर कैबिनेट मंत्री विक्रमादित्य सिंह के विभाग से जुड़ा है, जिसके चलते अब विभाग के तीन आलीशान विश्राम गृह और एक अधिशासी अभियंता (XEN) कार्यालय पर सरकारी कब्जे की जगह कुर्की का खतरा मंडरा रहा है।
यह पूरा विवाद करीब साढ़े तीन दशक पुराना है। साल 1988-89 में तत्कालीन सरकार ने जुब्बल के शलाड गांव में सड़क निर्माण के लिए चेतराम और राजेश कुमार नामक बागवानों के फलदार बगीचे उजाड़ दिए थे। सड़क तो बन गई, लेकिन प्रभावित भूमि मालिकों को उचित मुआवजा नहीं मिला। दशकों तक सरकारी दफ्तरों और अदालतों के चक्कर लगाने के बाद भी भुगतान लंबित रहा। वर्ष 2012 में उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बावजूद सरकार ने मुआवजा देने में ढिलाई बरती, तो अदालत को यह सख्त रुख अपनाना पड़ा।
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दो अलग.अलग याचिकाओं की सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि बार.बार आदेश दिए जाने के बावजूद सरकार और संबंधित विभागों ने मुआवजा राशि का भुगतान नहीं किया। दोनों मामलों में कुल मिलाकर लगभग तीन करोड़ रुपये की राशि देय पाई गई। न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि जब सरकारी एजेंसियां न्यायालय के आदेशों की अनदेखी करेंगी, तो कानून के तहत संपत्तियों की कुर्की जैसी कार्रवाई अनिवार्य हो जाती है।
अतिरिक्त जिला न्यायाधीश रोहड़ू ने स्पष्ट आदेश दिया है कि यदि मुआवजे का भुगतान नहीं होता है, तो विभाग की निम्नलिखित संपत्तियों को कुर्क कर लिया जाए
अदालत ने इन संपत्तियों के विरुद्ध वारंट जारी करते हुए 17 मार्च 2026 तक अनुपालन रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं।
अदालत ने टिप्पणी करते हुए संकेत दिया कि विकास परियोजनाओं के नाम पर किसानों की जमीन और बगीचे अधिग्रहित तो कर लिए जाते हैं, लेकिन उन्हें न्यायोचित मुआवजा देने में वर्षों नहीं बल्कि पीढ़ियां गुजर जाती हैं। यही वजह रही कि न्यायालय को सीधे सरकारी संपत्तियों के खिलाफ कार्रवाई का आदेश देना पड़ा जिसे कानूनी विशेषज्ञ प्रशासनिक जवाबदेही का बड़ा संदेश मान रहे हैं।
हैरानी की बात यह है कि 2012 में हाई कोर्ट के हस्तक्षेप के बावजूद सरकार ने ऊंट के मुंह में जीरे के समान राशि देकर अपना पल्ला झाड़ लिया था। वादियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुनील मोहन गोयल और उमेश शर्मा ने दलील दी कि विकास के नाम पर किसानों की आजीविका तो छीन ली गईए लेकिन मुआवजे के नाम पर उन्हें दशकों तक केवल तारीखें मिलीं।
कोर्ट ने 18 फरवरी को पारित अपने आदेश में साफ कर दिया है कि अब खोखले आश्वासनों का वक्त खत्म हो चुका है। संबंधित अधिकारियों को पांच दिन के भीतर आवश्यक कदम उठाने को कहा गया है।
चूंकि लोक निर्माण विभाग का जिम्मा युवा मंत्री विक्रमादित्य सिंह के पास है, ऐसे में विभाग की संपत्तियों की कुर्की का आदेश सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। यह आदेश न केवल वित्तीय प्रबंधन की विफलता को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि कैसे सरकारी सुस्ती आम आदमी के सब्र का बांध तोड़ देती है।