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April 15, 2026
हिमाचल में मार्कंडेय ऋषि का दिव्य स्नान- बैसाखी पर पिया धरती मां का दूध, पत्थरों से भगाए शैतान
स्नान के बाद मार्कंडेय ऋृषि ने पिया धरती मां का दूध
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कुल्लू। हिमाचल प्रदेश के जिला कुल्लू और मंडी की सरहद पर बसे नगवाईं क्षेत्र के मकराहड़ में मंगलवार को आस्था का ऐसा सैलाब उमड़ा, जिसने पूरे इलाके को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। यहां पर देवता मार्कंडेय ऋषि थरास ने हजारों देवलुओं और श्रद्धालुओं के साथ ब्यास और गोमती नदी के संगम पर पवित्र स्नान किया।
यह दिन देवता के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया गया- जिसमें सदियों पुरानी परंपराओं और मान्यताओं को विधिवत निभाया गया। सुबह से ही संगम तट पर श्रद्धालुओं की भीड़ जुटनी शुरू हो गई थी। जैसे ही देवता अपने देव रथ के साथ थरास गांव से निकले, ढोल-नगाड़ों और जयकारों से पूरा वातावरण गूंज उठा।
देव यात्रा मकराहड़ स्थित प्राचीन मंदिर पहुंची, जहां विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई। इसके बाद एक अनोखी परंपरा के तहत देवता के कारकून उल्टे पैरों संगम की ओर बढ़े-यह दृश्य श्रद्धालुओं के लिए रहस्य और आस्था का अद्भुत मिश्रण बना रहा।

संगम तट पर पहुंचते ही हजारों श्रद्धालुओं ने देवता के साथ ब्यास नदी में डुबकी लगाई। मान्यता है कि इस पावन स्नान से जीवन के कष्ट दूर होते हैं और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति मिलती है। यही कारण है कि लोग इस जल को बोतलों में भरकर अपने घर भी ले जाते हैं, ताकि पूरे वर्ष घर में पवित्रता बनी रहे।
इस पर्व की एक खास परंपरा ‘शैतानों को पत्थर मारने’ की भी रही, जिसे स्नान से पहले सांकेतिक रूप से निभाया गया। यह प्रतीकात्मक क्रिया बुराइयों और नकारात्मक शक्तियों को दूर करने का संकेत मानी जाती है।
स्थानीय पुजारी पुरुषोत्तम शर्मा के अनुसार, इस स्थान का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यहीं पर कभी खेत की जुताई के दौरान देवता का मोहरा मिला था- जो आज भी यहां आस्था का केंद्र बना हुआ है।
पवित्र स्नान के बाद देवता उस खेत की ओर गए, जहां सदियों पहले मोहरा मिलने की कथा जुड़ी हुई है। यहां जो दृश्य सामने आया, उसने हर किसी को भावुक कर दिया। देव रथ बार-बार उसी स्थान की ओर झुकता रहा, मानो धरती मां की गोद में समा रहा हो।

मान्यता के अनुसार, इस दिन धरती माता अपने बालक रूपी ऋषि को गोद में लेकर उसका लालन-पालन करती हैं। इसे ‘धरती का दूध पिलाने’ की रस्म के रूप में देखा जाता है। जैसे ही यह परंपरा निभाई गई, वहां मौजूद हजारों लोगों के बीच ‘ऋषि मार्कंडेय’ के जयघोष गूंज उठे।
इस दौरान देवता के गुर ने भविष्यवाणी करते हुए क्षेत्र में सुख-शांति और समृद्धि का संदेश दिया, जिसे श्रद्धालुओं ने श्रद्धा से सुना। वहीं, देवता के कारदार जीवन प्रकाश ने मंडी और कुल्लू सराज से आए विभिन्न देवी-देवताओं के कारकूनों का पारंपरिक स्वागत किया। इस संगम पर्व में बंजार और सराज क्षेत्र से भी बड़ी संख्या में देवलू शामिल हुए, जिससे यह आयोजन और भी भव्य बन गया।
हर साल बैसाखी के अवसर पर आयोजित होने वाला यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं- बल्कि लोक आस्था, प्रकृति और परंपरा के गहरे संबंध का प्रतीक है। यहां उमड़ने वाली भीड़ इस बात का प्रमाण है कि आधुनिकता के दौर में भी लोगों की जड़ें अपनी संस्कृति और विश्वास से कितनी मजबूती से जुड़ी हुई हैं।