#विविध
August 2, 2025
हिमाचल में एक दौर ऐसा भी- जब जज के बराबर थी सरपंच की पावर, हर फैसले पर होता था अमल
जमीन के बंटवारे के विवाद पंचायत तय करती थी
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कांगड़ा। आज भले ही ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायतें मुख्यतः विकास कार्यों तक सीमित हैं, लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जनपद में सरपंच की हैसियत किसी न्यायाधीश से कम नहीं होती थी।
ब्रिटिश शासन से पहले यहां की सामाजिक व्यवस्था गांव स्तर पर ही अनुशासित और स्वशासित थी, जिसमें पंचायतें न केवल प्रशासनिक बल्कि न्यायिक जिम्मेदारी भी निभाती थीं। पंचायतें विवाह विवाद, जमीन बंटवारा, पशु चोरी, पारिवारिक झगड़े जैसे कई मामलों में अंतिम निर्णय देती थीं और उनके फैसले को सामाजिक रूप से बाध्यकारी माना जाता था।
इस गौरवपूर्ण ग्रामीण व्यवस्था की ऐतिहासिक झलक उस समय के ब्रिटिश भारतीय सेवा के वरिष्ठ अधिकारी लियोनार्ड मिडलटन की लिखी पुस्तक ‘कस्टमरी लॉ ऑफ कांगड़ा डिस्ट्रिक्ट’ में मिलती है। यह पुस्तक कांगड़ा की स्थानीय परंपराओं, सामाजिक रीति-रिवाजों और ग्राम स्तर की न्यायिक व्यवस्था का विस्तृत चित्रण प्रस्तुत करती है।
लियोनार्ड मिडलटन को 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में कांगड़ा जिले की लैंड सेटलमेंट प्रक्रिया, भूमि रिकॉर्डिंग और कराधान प्रणाली का अध्ययन करने के लिए नियुक्त किया गया था। इसी कार्य के दौरान उन्होंने कांगड़ा की गहन सामाजिक और जातीय संरचना को समझा और स्थानीय न्याय परंपराओं को एक कानूनी दस्तावेज का रूप दिया।
मिडलटन की पुस्तक में दर्ज कई महत्वपूर्ण तथ्य आज भी समाजशास्त्र और विधिशास्त्र के शोधकर्ताओं के लिए आधारभूत माने जाते हैं। मसलन-
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लियोनार्ड मिडलटन की पुस्तक सिर्फ एक इतिहास दस्तावेज नहीं रही, बल्कि ब्रिटिश प्रशासन ने इस ‘कस्टमरी लॉ’ को विधिवत मान्यता देकर कानूनी ढांचे में शामिल किया। इसके आधार पर-