#विविध

October 16, 2026

हिमाचल में तबाही नहीं मचा पाएंगी ग्लेशियर झीले, घेपन झील में लगा भारत का पहला अर्ली वार्निंग सिस्टम

हिमाचल में भारत के पहले GLOF अर्ली वार्निंग सिस्टम की स्थापना, ISRO ने दी थी चेतावनी

शेयर करें:

Lahaul spiti News

केलंग। हिमाचल प्रदेश के ऊंचे पहाड़ों में तेजी से बदलती प्राकृतिक परिस्थितियां भविष्य में बड़े खतरे का संकेत दे रही हैं। ग्लेशियरों के पिघलने से बन रही झीलों और उनके बढ़ते आकार ने हिमालयी क्षेत्रों में आपदा का जोखिम बढ़ा दिया है। इन झीलों में जमा पानी यदि अचानक बाहर निकलता है या झील का प्राकृतिक बांध टूट जाता है, तो निचले इलाकों में बाढ़ और भारी तबाही की स्थिति पैदा हो सकती है।'

 

इसी संभावित खतरे को देखते हुए लाहौल-स्पीति जिला प्रशासन ने सतर्कता बढ़ा दी है। जिले की ऊंची पहाड़ियों पर स्थित घेपन घाट हिमनद झील पर भारत की पहली ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली स्थापित की गई है। यह आधुनिक तकनीक झील की स्थिति पर नजर रखने और संभावित खतरे के संकेत समय रहते प्राप्त करने में मदद करेगी।

4,100 मीटर की ऊंचाई पर तैनात हुई आधुनिक तकनीक

लाहौल-स्पीति की दुर्गम पहाड़ियों में समुद्र तल से लगभग 4,100 मीटर की ऊंचाई पर स्थित घेपन घाट झील पर स्थापित यह प्रणाली हिमनद झील से उत्पन्न होने वाले संभावित जोखिमों की निगरानी की दिशा में अहम कदम है। इस प्रणाली को सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्यूटिंग (C-DAC) ने विकसित किया है। यह राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) द्वारा वित्तपोषित पायलट परियोजना का हिस्सा है।

 

यह भी पढ़ें : ऑनलाइन शॉपिंग करने वाले हो जाएं सावधान.... हिमाचल में शातिरों ने युवती से ठग लिए 5.64 लाख रुपए

 

इसका उद्देश्य झील और आसपास के पर्यावरण में होने वाले बदलावों की निगरानी करना तथा संभावित आपदा की स्थिति में प्रशासन को समय रहते सतर्क करने में सहायता देना है। हिमालय के दुर्गम क्षेत्रों में ऐसी तकनीक का इस्तेमाल आपदा प्रबंधन को अधिक वैज्ञानिक और प्रभावी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

झील का बढ़ता आकार बना चिंता का कारण

घेपन घाट हिमनद झील के बढ़ते क्षेत्रफल को लेकर पहले भी चिंता जताई जा चुकी है। नवंबर 2023 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने झील के क्षेत्रफल में वृद्धि के संबंध में जिला प्रशासन को अवगत करवाया था। इसके बाद झील से जुड़े संभावित खतरों का आकलन करने, वैज्ञानिक अध्ययन को आगे बढ़ाने और संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान करने के लिए प्रयास किए गए।

 

यह भी पढ़ें : खुशखबरी...दिवाली पर सुक्खू सरकार ने दिया बड़ा तोहफा : 1300 बढ़ाई दिव्यांगों की पेंशन

 

हिमनद झीलों में पानी की मात्रा बढ़ने, आसपास की बर्फ और चट्टानों में बदलाव होने तथा प्राकृतिक बांधों के कमजोर पड़ने जैसी परिस्थितियां अचानक बाढ़ का कारण बन सकती हैं। ऐसी स्थिति में पानी के तेज बहाव से निचले क्षेत्रों में जान-माल और बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचने का जोखिम रहता है। हालांकि, किसी झील का आकार बढ़ना अपने आप में उसके तत्काल टूटने का प्रमाण नहीं है, लेकिन इससे निरंतर निगरानी और जोखिम का वैज्ञानिक आकलन करना जरूरी हो जाता है।

उपायुक्त किरण भड़ाना ने की पहल

घेपन घाट झील की निगरानी व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए उपायुक्त एवं जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की अध्यक्ष किरण भड़ाना लगातार राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के संपर्क में थीं। प्रशासन का उद्देश्य ऐसी प्रणाली स्थापित करना था, जिससे झील के जलस्तर और वहां की परिस्थितियों से जुड़े आंकड़े लगातार प्राप्त किए जा सकें।

यह भी पढें : सुक्खू सरकार किसानों के लिए करने जा रही कुछ बड़ा, बदल जाएगी उनकी किस्मत! जानें क्या है मास्टर प्लान

इस सिलसिले में उपायुक्त किरण भड़ाना ने स्वयं भी घेपन झील का दौरा किया था। अब यहां प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली की स्थापना से निगरानी व्यवस्था को मजबूती मिलने की उम्मीद है। इससे प्रशासन को संभावित बदलावों को समझने, जोखिम का आकलन करने और जरूरत पड़ने पर एहतियाती कदम उठाने में सहायता मिल सकती है।

कई उपकरण करेंगे निगरानी

घेपन घाट झील में स्थापित अर्ली वार्निंग सिस्टम में कई तकनीकी उपकरण शामिल किए गए हैं। इनमें बुआय आधारित झील निगरानी स्टेशन, स्वचालित मौसम स्टेशन और ग्लेशियर विजन यूनिट प्रमुख हैं। इन उपकरणों के माध्यम से झील और उसके आसपास के पर्यावरणीय बदलावों की निगरानी की जाएगी। मौसम की परिस्थितियों और झील से जुड़े आंकड़ों को समझने से संभावित जोखिम की पहचान करने में मदद मिल सकती है। इस तरह यह प्रणाली केवल झील की निगरानी तक सीमित नहीं है, बल्कि क्षेत्र में आपदा संबंधी तैयारियों को मजबूत करने का भी एक महत्वपूर्ण माध्यम है।

 

यह भी पढ़ें : CM सुक्खू बागियों पर भड़के, बोले- 'कांग्रेस ने मां-बेटे को दिया सम्मान फिर भी BJP के हाथों बिक गए'

 

हालांकि, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली किसी भी आपदा को पूरी तरह रोकने की गारंटी नहीं देती। इसकी प्रभावशीलता निगरानी उपकरणों के सही संचालन, आंकड़ों के विश्लेषण, संचार व्यवस्था और चेतावनी मिलने पर प्रशासन की त्वरित कार्रवाई पर निर्भर करेगी।

चंद्रा-चिनाब नदी क्षेत्र में बाढ़ के निशान लगाने का काम पूरा

जिले में आपदा प्रबंधन को मजबूत करने के लिए अन्य महत्वपूर्ण कदम भी उठाए गए हैं। प्रशासन के अनुसार, चंद्रा-चिनाब यानी चंद्रभागा नदी क्षेत्र में उच्चतम बाढ़ स्तर के चिह्नांकन का कार्य 100 प्रतिशत पूरा कर लिया गया है। इस पहल से नदी के किनारे संभावित बाढ़ जोखिम वाले क्षेत्रों को समझने, लोगों को जागरूक करने और भविष्य की आपदा योजनाओं को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है। बाढ़ के ऐतिहासिक स्तरों और संवेदनशील स्थानों की पहचान आपातकालीन तैयारियों के लिहाज से महत्वपूर्ण होती है।

यह भी पढ़ें : हिमाचल में 10 वर्षीय जुड़वां बहनों के साथ पिता ने की नीच*ता : पुलिस पर केस दबाने के आरोप

दुर्गम पहाड़ों में कई एजेंसियों ने मिलकर पूरा किया मिशन

घेपन घाट झील तक पहुंचना और वहां तकनीकी उपकरण स्थापित करना आसान काम नहीं था। अत्यधिक ऊंचाई, कठिन पहाड़ी रास्तों और मौसम में अचानक बदलाव जैसी चुनौतियों के बीच इस परियोजना को पूरा किया गया। इस कार्य में जिला प्रशासन और जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने प्रशासनिक स्वीकृतियों, आवश्यक लॉजिस्टिक व्यवस्था और फील्ड स्तर पर समन्वय की जिम्मेदारी निभाई। हिमाचल प्रदेश राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, अटल बिहारी वाजपेयी पर्वतारोहण एवं संबद्ध खेल संस्थान, राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF), चिकित्सा एवं पुलिस दलों तथा अन्य सहयोगी एजेंसियों ने भी योगदान दिया। विभिन्न विभागों और फील्ड टीमों के समन्वित प्रयासों से दुर्गम क्षेत्र में इस आधुनिक प्रणाली की स्थापना संभव हो सकी।

हिमालय की झीलों पर नजर रखना अब पहले से ज्यादा जरूरी

हिमाचल प्रदेश में हिमनद झीलों की निगरानी जलवायु परिवर्तन और पर्वतीय आपदा जोखिमों के संदर्भ में लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ग्लेशियरों और झीलों की स्थिति में बदलाव का प्रभाव नदियों के बहाव, घाटियों और निचले इलाकों की सुरक्षा पर पड़ सकता है। घेपन घाट झील पर स्थापित अर्ली वार्निंग सिस्टम इसी चुनौती से निपटने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। इससे प्राप्त आंकड़ों के आधार पर जोखिम को बेहतर ढंग से समझने और आपदा प्रबंधन की तैयारियों को मजबूत करने में मदद मिल सकती है।

नोट : ऐसी ही तेज़, सटीक और ज़मीनी खबरों से जुड़े रहने के लिए इस लिंक पर क्लिक कर हमारे फेसबुक पेज को फॉलो करें

ट्रेंडिंग न्यूज़
LAUGH CLUB
संबंधित आलेख