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July 17, 2026

देवभूमि पर मंडराया महासंकट ! कभी भी तबाही मचा सकते हैं ये दरकते पहाड़, IIT मंडी के शोध में खुलासा

 लाहुल का जाहलमा नाला, कोटरूपी, पराशर सहित ये पहाड़ कभी भी मचा सकते हैं तबाही

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IIT Mandi rescrach

मंडी। कुदरत के अनमोल खजाने और शांत वादियों के लिए मशहूर देवभूमि हिमाचल प्रदेश इस समय एक बेहद खौफनाक दौर से गुजर रही है। देवभूमि के विशालकाय पहाड़ अब धीरे-धीरे अंदर से दरकने लगे हैं, जो आने वाले समय में प्रदेश में भारी तबाही मचा सकते हैं। इस गंभीर खतरे पर भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) मंडी के वैज्ञानिकों के एक ताजा शोध ने बेहद चौंकाने वाला और डरावना खुलासा किया है। शोध के अनुसार, राज्य के कई संवेदनशील इलाकों में पहाड़ अपनी जगह छोड़ रहे हैं और किसी भी क्षण बड़ा मलबा नीचे गिर सकता है, जो भारी जान-माल के नुकसान का सबब बन सकता है।

आईआईटी मंडी की रिसर्च में बड़ा खुलासा

मंडी आईआईटी के स्कूल ऑफ सिविल एंड एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग के वैज्ञानिकों ने अपनी रिसर्च में स्पष्ट किया है कि हिमाचल के पहाड़ों की बनावट में बड़ा अंतर है, जिसके कारण आपदा का रूप भी बदल रहा है। शोध के अनुसार, किन्नौर जिला के पहाड़ मुख्य रूप से 'हार्ड रॉक' यानी बेहद कठोर चट्टानों से बने हैं, लेकिन ये चट्टानें अब अंदरूनी दबाव के कारण भीतर से टूट रही हैं।

 

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इसके विपरीत, मंडी और लाहुल-स्पीति जिलों के पहाड़ 'सॉफ्ट रॉक' यानी बेहद कमजोर और नरम चट्टानों व मिट्टी से बने हैं। इसी वजह से इन क्षेत्रों में पूरी की पूरी जमीन नीचे की तरफ खिसक रही है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में लैंडस्लाइड कहा जाता है। वैज्ञानिकों ने केवल मंडी और कुल्लू जिलों में ही अब तक करीब 6500 भूस्खलन संभावित क्षेत्रों (लैंडस्लाइड्स) को मैप किया है।

लाहुल का जाहलमा नाला और कोटरूपी टाइम बम बन हैं खड़े

इस शोध में सबसे ज्यादा डराने वाली स्थिति लाहुल के जाहलमा नाले से सटे पहाड़ की सामने आई है। यह पहाड़ अब फटने और दरकने के सीधे संकेत दे रहा है। जाहलमा नाले में पानी का बहाव बिना किसी बाहरी स्रोत के अप्रत्याशित रूप से बढ़ता जा रहा है, जबकि इस नाले के ठीक पीछे पानी का कोई ज्ञात स्त्रोत या ग्लेशियर नहीं है। वैज्ञानिकों का मानना है कि पहाड़ के भीतर मलबे और पानी की हलचल इस कदर बढ़ चुकी है कि यह कभी भी बड़े कहर का रूप ले सकती है।

 

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इसी तरह का गंभीर संकट मंडी-जोगिंद्रनगर राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित कोटरूपी पहाड़ पर भी मंडरा रहा है। कोटरूपी का एक हिस्सा फिर से भयानक तबाही मचाने पर आमादा दिख रहा है। जोगिंद्रनगर से मंडी की ओर आने वाले हिस्से में पहाड़ के भीतर लगातार हलचल दर्ज की जा रही है और यहां पर मिट्टी लगातार धंस रही है।

पराशर पहाड़ भी कहर बरपाने के मूड में

शोध के निष्कर्षों की मानें तो देव पराशर के प्राचीन और पवित्र क्षेत्र के पहाड़ भी अब सुरक्षित नहीं रहे हैं। पराशर के पहाड़ तेजी से दरक रहे हैं और वैज्ञानिकों ने पाया है कि इनके खिसकने की गति पहले की तुलना में काफी ज्यादा तेज हो गई है। यह पहाड़ इस समय पूरी तरह से कहर बरपाने के मूड में नजर आ रहा है। इसके अलावा, कालंग गांव में जमीन का फटना और चौड़ी दरारें आना भी इसी खतरे का जीता-जागता सबूत है।

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दूसरी तरफ सुंदरनगर, हनोगी, औट और बांदला के पहाड़ भी बेहद कमजोर हो चुके हैं। फोरलेन राजमार्ग के निर्माण के लिए की गई कटिंग की वजह से यहां की चट्टानें हिल चुकी हैं और तमाम कोशिशों के बाद भी वे स्थिर नहीं हो पा रही हैं। बारिश का पानी जब इन दरारों में जाता है, तो बड़े पैमाने पर भूस्खलन शुरू हो जाता है। वहीं, गुम्मा का पहाड़ नमकीन पानी के रिसाव के कारण अंदर ही अंदर पूरी तरह खोखला हो चुका है।

विज्ञान की नजर में क्यों ढह रहे हैं पहाड़?

मंडी आईआईटी के स्कूल ऑफ सिविल एंड एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर डेरिक्स ने इस भौगोलिक बदलाव पर विस्तार से प्रकाश डाला है। उनके अनुसार, इन क्षेत्रों में पाई जाने वाली 'सैंडस्टोन लिथोलॉजी' (बलुआ पत्थर की संरचना) भूस्खलन के लिहाज से सबसे नाजुक और खतरनाक होती है।

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जब इन कमजोर चट्टानों पर मूसलाधार बारिश होती है, तो पानी रिसकर चट्टान के गहरे हिस्सों तक पहुंच जाता है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में 'वेटिंग फ्रंट' का बढ़ना कहते हैं। इसके कारण मिट्टी की पानी सोखने की क्षमता (सॉइल सक्शन) घट जाती है और चट्टानों को आपस में जोड़े रखने वाली ताकत (शीयर स्ट्रेंथ) कमजोर पड़ जाती है। यही वजह है कि अचानक पूरा का पूरा पहाड़ भरभरा कर नीचे गिर जाता है।

अर्ली वार्निंग सिस्टम करेगा अलर्ट

इस भयावह खतरे के बीच आईआईटी मंडी के वैज्ञानिकों ने राहत की एक उम्मीद भी जगाई है। वैज्ञानिकों ने पूरे भारतीय हिमालयी क्षेत्र को ध्यान में रखते हुए एक विशेष 'लैंडस्लाइड अर्ली वार्निंग सिस्टम' तैयार किया है। यह आधुनिक तकनीक पूरी तरह से वर्षा के आंकड़ों, मशीन लर्निंग मॉडल और वहां की भौगोलिक संवेदनशीलता के मानचित्रों पर काम करती है। इसमें नासा के सैटेलाइट से मिलने वाले डेटा की मदद से आगामी 15 दिनों के बारिश के पैटर्न का विश्लेषण किया जाता है, जिससे समय रहते संभावित भूस्खलन की चेतावनी जारी की जा सके और जान-माल के नुकसान को टाला जा सके।

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