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March 27, 2026
हरीश राणा की अस्थियां हरिद्वार में विसर्जित कर हिमाचल लौटा परिवार, पैतृक गांव में होगी तेहरवीं
प्रशासनिक स्तर से भी मिलना चाहिए परिवार को सहारा
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कांगड़ा। ज़िंदगी से जंग और दर्द से मुक्ति की पुकार… हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के हरीश राणा की यह पीड़ादायक कहानी एक ऐसे मोड़ पर आकर रुकी, जहां उम्मीद और असहायता आमने-सामने खड़ी थीं। बीते 13 सालों से कई अस्पतालों में जिंदगी की जंग लड़ते हुए आखिरकार दिल्ली एम्स में चला लंबा इलाज थम गया।
इस घटनाक्रम ने सुप्रीमकोर्ट द्वारा निर्धारित इच्छामृत्यु की सीमाओं और नियति के फैसले के बीच चल रही बहस को और गहरा कर दिया कि, क्या दर्द से मुक्ति का अधिकार भी इंसान को मिलना चाहिए?
बता दें कि हरीश राणा की अस्थियां वीरवार को हरिद्वार में गंगा में विसर्जित कर दी गईं। इसके बाद उनका परिवार अपने पैतृक गांव पलेटा के लिए रवाना हो गया, जहां तेरहवीं सहित अन्य सभी धार्मिक संस्कार किए जाएंगे। इस कठिन समय में परिवार गहरे शोक में है।
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हरीश राणा के निधन के बाद राजनगर एक्सटेंशन की राज एंपायर सोसायटी में बुधवार देर शाम श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। परिवार पहले काफी शोक में था और उन्हें सभा में शामिल कराने के लिए कई बार मनाया गया। पिता अशोक राणा भी कई बार आग्रह के बाद सभा में पहुंचे। गमगीन माहौल में सभी उपस्थित लोगों ने हरीश को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि दी और परिवार के साहस और धैर्य की सराहना की।
हरीश राणा के निधन के बाद उनका परिवार अब पैतृक गांव पलेटा लौट रहा है। हरीश के मामा मिलाप ने बताया कि सभी धार्मिक विधियां संपन्न करने के बाद परिवार गांव लौट रहा है। शुक्रवार सुबह करीब 4 बजे परिवार के घर पहुंचने की संभावना है। गांव में परिवार के आने की खबर से शोक का माहौल फैल गया है।
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सोसायटी में रहने वाले VN शर्मा ने यह भी बताया कि न तो अंतिम संस्कार के समय और न ही उसके बाद अब तक कोई जनप्रतिनिधि या अधिकारी परिवार से मिलने नहीं पहुंचा। इस पर लोग हैरान हैं और उनका मानना है कि इस कठिन समय में परिवार को प्रशासनिक स्तर से भी सहारा मिलना चाहिए।
ग्रामीणों का कहना है कि हरीश राणा का निधन न सिर्फ उनके परिवार, बल्कि पूरे इलाके के लिए बड़ी भावनात्मक क्षति है। भले ही परिवार लंबे समय से गांव से बाहर रहा, लेकिन गांव से उनका जुड़ाव हमेशा बना रहा।
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गांववासी इस कठिन समय में परिवार के साथ खड़े हैं और हरीश राणा की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना कर रहे हैं। NP शर्मा ने बताया कि परिवार ने अस्थियां चुनने के बाद हरिद्वार में उन्हें विसर्जित किया। अब सभी सदस्य पलेटा लौट रहे हैं, जहां तेरहवीं और अन्य सभी संस्कार पूरे किए जाएंगे।
बता दें कि करीब 13 साल पहले चंडीगढ़ में हुए एक हादसे ने हरीश राणा और उनके परिवार की जिंदगी पूरी तरह बदल दी। PG की चौथी मंजिल से गिरने के बाद हरीश कोमा में चले गए थे। उस हादसे के बाद उनकी आंखें खुलीं नहीं, लेकिन परिवार की उम्मीदें कभी खत्म नहीं हुईं।
हरीश का परिवार मूल रूप से कांगड़ा जिले के जयसिंहपुर क्षेत्र से था। करीब 30 साल पहले रोजगार की तलाश में यह परिवार दिल्ली आया। हरीश के पिता अशोक राणा ने बेटे के इलाज के लिए हर संभव कोशिश की। अस्पतालों के चक्कर लगाए, दवाइयों का खर्च उठाया और आर्थिक तंगी के बावजूद उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा।
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परिवार के लिए यह सफर आसान नहीं था। इलाज का खर्च इतना बढ़ गया कि उन्हें अपना घर बेचकर गाजियाबाद के एक छोटे फ्लैट में रहना पड़ा। लेकिन परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, हरीश के लिए पिता और परिवार का संघर्ष कभी कम नहीं हुआ। हरीश के इलाज में हर संभव प्रयास किए गए, लेकिन समय के साथ डॉक्टरों ने साफ कर दिया कि सुधार की कोई संभावना नहीं है।
इसके बाद परिवार के सामने सबसे कठिन निर्णय आया अपने बेटे के लिए इच्छामृत्यु की अनुमति लेना। सुप्रीम कोर्ट से अनुमति मिलने के बाद प्रक्रिया धीरे-धीरे शुरू हुई। हर कदम पर परिवार ने हरीश की अंतिम इच्छाओं और सम्मान का ध्यान रखा। 24 मार्च 2026 की शाम वह क्षण भी आया, जब हरीश की सांसें हमेशा के लिए थम गईं। 13 साल की लंबी पीड़ा, संघर्ष और इंतजार का खामोश अंत हुआ।