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August 20, 2026

हिमाचल हाईकोर्ट की सुक्खू सरकार को फटकार, अपील भी खारिज की और लगा दिया 25 हजार जुर्माना

पहले से तय मामले में बार-बार अपील पर हाईकोर्ट ने की सख्त टिप्पणी

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शिमला। हिमाचल की सुक्खू सरकार पर एक बार फिर हिमाचल हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी से जुड़े एक मामले में पहले से तय कानूनी स्थिति के बावजूद बार-बार अपील करने और अदालती मामलों में ढुलमुल रवैया अपनाने पर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने सरकार की अपील खारिज करने के साथ 25 हजार रुपये का अनुकरणीय जुर्माना भी लगाया है। हाईकोर्ट की टिप्पणी से साफ है कि सरकारी विभागों की ओर से बिना ठोस आधार के बार-बार मुकदमेबाजी को अदालत अब गंभीरता से देख रही है।

पहले से तय मामले में फिर पहुंची सरकार

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायमूर्ति बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि जब किसी विषय पर कानूनी स्थिति पहले ही स्पष्ट हो चुकी है, तब भी सरकार की ओर से अपील दायर करना समझ से परे है। खंडपीठ ने सरकार के इस रवैये पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि राज्य सरकार अंधेरे में तीर चलाने के लिए ऊपरी अदालत का रुख कर रही है। अदालत ने यह भी कहा कि सरकारी मुकदमों में अपनाई जा रही इस तरह की ढुलमुल नीति से न्यायिक प्रक्रिया पर अनावश्यक बोझ पड़ता है।

 

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चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के पक्ष में फैसला

मामला वन विभाग से जुड़े इंटीग्रेटेड वॉटरशेड डेवलपमेंट प्रोजेक्ट में कार्यरत रहे दैनिक वेतन भोगी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी राम गोपाल से संबंधित है। राम गोपाल की वर्ष 1993 में दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी के तौर पर नियुक्ति हुई थी। मामले में एकल पीठ ने 21 नवंबर 2025 को कर्मचारी के पक्ष में फैसला सुनाया था। अदालत ने सरकार को निर्देश दिए थे कि कर्मचारी को आठ वर्ष की निरंतर सेवा पूरी करने के आधार पर 1 जनवरी 2001 से नियमितीकरण और वर्क-चार्ज स्टेटस का लाभ दिया जाए। राज्य सरकार ने एकल पीठ के फैसले को खंडपीठ के समक्ष चुनौती दी, लेकिन सुनवाई के दौरान सरकार की अपील को राहत नहीं मिली।

संत राम मामले का फैसला भी सरकार की दलील पर भारी पड़ा

सरकार ने अपनी अपील के पक्ष में उस मामले का हवाला दिया, जिसकी कानूनी स्थिति पहले ही सुप्रीम कोर्ट तक स्पष्ट हो चुकी थी। सरकार का तर्क था कि राम गोपाल को संबंधित लाभ वर्ष 2001 में मिलना था, लेकिन उन्होंने करीब 23 वर्ष बाद वर्ष 2024 में अदालत का दरवाजा खटखटाया। इसलिए सरकार ने देरी के आधार पर उनकी याचिका खारिज करने की मांग की।

 

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हालांकि, हाईकोर्ट ने सरकार की इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने माना कि कर्मचारी की ओर से देरी के पीछे परिस्थितियां थीं और लंबे समय से चल रही न्यायिक प्रक्रिया के अंतिम परिणाम की प्रतीक्षा करना पूरी तरह असंगत नहीं कहा जा सकता।

सरकार की नीति ने ही मजबूत किया कर्मचारी का दावा

खंडपीठ ने यह भी ध्यान में रखा कि राज्य सरकार ने खुद 9 अक्टूबर 2012 को नियमितीकरण की नीति जारी की थी। अदालत ने कहा कि पात्र कर्मचारियों को नीति का लाभ देना सरकार की जिम्मेदारी है। ऐसे में केवल देरी का हवाला देकर कर्मचारी के अधिकार को नकारना उचित नहीं है। अदालत ने माना कि कर्मचारी लंबे समय से संबंधित कानूनी विवादों के अंतिम परिणाम का इंतजार कर रहा था और इस वजह से उसकी ओर से हुई देरी को परिस्थितियों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

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मॉडल एम्प्लॉयर सरकार को क्यों लगी फटकार

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में राज्य सरकार की भूमिका पर बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि राज्य एक ‘मॉडल एम्प्लॉयर’ यानी आदर्श नियोक्ता होता है। इसके बावजूद यदि सरकार उन्हीं मामलों में अपील करती रहे, जिन पर कानून और अदालतों के फैसलों के जरिए स्थिति पहले ही तय हो चुकी है, तो इससे सरकारी व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल उठते हैं।

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अदालत ने कहा कि इस तरह की मुकदमेबाजी से न्यायालय का बहुमूल्य समय तो बर्बाद होता ही है, साथ ही सीमित आर्थिक संसाधनों वाले चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को भी लंबे समय तक मानसिक और वित्तीय परेशानी से गुजरना पड़ता है।

अंधेरे में तीर वाली टिप्पणी के साथ 25 हजार का जुर्माना

सरकार के बार-बार अपील करने के रवैये पर नाराजगी जताते हुए खंडपीठ ने कहा कि संबंधित विभागों को उनकी जिम्मेदारी का अहसास कराने के लिए जुर्माना लगाना जरूरी हो गया है। इसी के साथ अदालत ने राज्य सरकार की अपील को 25 हजार रुपये के अनुकरणीय जुर्माने के साथ खारिज कर दिया। हाईकोर्ट की यह टिप्पणी सरकारी विभागों के लिए एक स्पष्ट संदेश के तौर पर देखी जा रही है कि पहले से तय कानूनी मामलों में महज संभावना के आधार पर बार-बार अपील करना सरकारी संसाधनों और न्यायालय के समय, दोनों पर अनावश्यक बोझ डाल सकता है।

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