#विविध
June 26, 2026
हिमाचल HC का बड़ा फैसला : एक साल में निपटाने होंगे बच्चों से जुड़े केस, नहीं चलेगा कोई बहाना
30 दिनों के भीतर पीड़ित बच्चों का बयान दर्ज करना अनिवार्य
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शिमला। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई में हो रही देरी पर गंभीर चिंता जताते हुए महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया है कि पोक्सो अधिनियम के तहत दर्ज मामलों का ट्रायल हरसंभव एक वर्ष के भीतर पूरा किया जाना चाहिए, ताकि पीड़ित बच्चों को समय पर न्याय मिल सके और उन्हें लंबी कानूनी प्रक्रिया से गुजरने के कारण मानसिक पीड़ा का सामना न करना पड़े।
दरअसल, यह टिप्पणी हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति संदीप शर्मा ने एक जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान की। अदालत ने कहा कि पोक्सो कानून की धारा 35 का उद्देश्य ऐसे मामलों का त्वरित निपटारा सुनिश्चित करना है, लेकिन कई मामलों में निर्धारित समय-सीमा का पालन नहीं हो रहा है।
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इससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो रही है और आरोपी पक्ष भी सुनवाई में देरी को आधार बनाकर जमानत की मांग कर रहे हैं। अदालत ने माना कि बच्चों से जुड़े संवेदनशील मामलों में अनावश्यक देरी न्याय के मूल उद्देश्य को प्रभावित करती है। इसलिए विशेष अदालतों को कानून में निर्धारित समयसीमा के भीतर सुनवाई पूरी करने के लिए गंभीर प्रयास करने होंगे।

हाईकोर्ट ने इस संबंध में राज्य के रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिए हैं कि प्रदेश की सभी अधीनस्थ अदालतों और न्यायिक अधिकारियों को पोक्सो अधिनियम की धारा 35 के प्रावधानों के बारे में जागरूक किया जाए। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाए कि भविष्य में ऐसे मामलों की सुनवाई तय समय-सीमा के भीतर पूरी हो।
इसके अलावा अदालत ने अतिरिक्त महाधिवक्ता को आदेश दिया कि फैसले की प्रति प्रदेश के गृह सचिव को उपलब्ध कराई जाए। गृह सचिव राज्यभर के लोक अभियोजकों यानी पब्लिक प्रॉसिक्यूटर को आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करेंगे, ताकि पोक्सो मामलों में कानून के प्रावधानों का प्रभावी तरीके से पालन सुनिश्चित किया जा सके।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी याद दिलाया कि पोक्सो अधिनियम की धारा 35 के अनुसार विशेष अदालत को मामले का संज्ञान लेने के 30 दिनों के भीतर पीड़ित बच्चे का बयान दर्ज करना अनिवार्य है। इसके बाद पूरी न्यायिक प्रक्रिया को यथासंभव एक वर्ष के भीतर पूरा किया जाना चाहिए।
अदालत का मानना है कि त्वरित सुनवाई से न केवल पीड़ित बच्चों को शीघ्र न्याय मिलेगा, बल्कि न्याय व्यवस्था पर लोगों का विश्वास भी मजबूत होगा। वहीं मामलों के लंबित रहने से उत्पन्न होने वाली कानूनी और सामाजिक जटिलताओं को भी काफी हद तक कम किया जा सकेगा।