#विविध
April 4, 2026
हिमाचल : पिता का हौसला बनी 5 बेटियां, मेले में एकजुट हो चला रही मिठाई की दुकान- बनीं प्रेरणा
पापा की परी नहीं, पापा की शेरनियां बनीं पांच बहनें
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मंडी। हिमाचल प्रदेश में मंडी जिले के जोगिंदर नगर के वार्षिक मेले में इस बार एक परिवार की कहानी लोगों का ध्यान खींच रही है। ये परिवार जो मेहनत, संघर्ष और आपसी एकता की मिसाल बन गया है।
मेले में हर तरफ जलेबी और पकौड़ों की खुशबू तैर रही है। मगर इन खुशबुओं के बीच एक छोटी-सी दुकान ऐसी भी है, जहां स्वाद के साथ-साथ परिवार की मजबूत नींव भी परोसी जा रही है।
यह दुकान बरोट घाटी से आए एक परिवार की है, जिसे पांच बहनें और एक भाई मिलकर संभाल रहे हैं। खास बात यह है कि यहां कोई बाहरी मदद नहीं है- हर सदस्य अपनी जिम्मेदारी खुद निभाता है।

कोई कढ़ाही में जलेबी का घोल घुमा रहा है, तो कोई गरमा-गरम पकौड़े तल रहा है, जबकि बाकी सदस्य ग्राहकों की भीड़ को संभालने में जुटे हैं। इस दुकान पर काम करते हुए परिवार का हर सदस्य एक टीम की तरह नजर आता है।
परिवार की बड़ी बेटी सोनिया बताती हैं कि उनके लिए यह सिर्फ दुकान नहीं, बल्कि उनके परिवार की पहचान है। वह मुस्कुराते हुए कहती हैं हम पांचों बहनें हाथ की उंगलियों की तरह हैं। कोई छोटी है, कोई बड़ी, लेकिन जब हम साथ होती हैं, तो हमारी ताकत कई गुना बढ़ जाती है
सोनिया का यह आत्मविश्वास सिर्फ शब्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके काम में साफ झलकता है। उन्होंने समाज की अन्य लड़कियों को भी संदेश दिया कि बेटियों को सिर्फ ‘पापा की परी’ बनकर नहीं रहना चाहिए, बल्कि ‘पापा की शेरनी’ बनकर परिवार का सहारा बनना चाहिए। उनके मुताबिक हम बहनें घर के पिल्लर हैं और हमारे पापा उस घर की छत हैं।

वहीं, दूसरी बहन मोनिका परिवार की दिनचर्या और जिम्मेदारियों के बारे में बताती हैं। वह कहती हैं कि उनकी सबसे बड़ी बहन सोनिया जोगिंदर नगर में फैशन डिजाइनिंग का कोर्स कर रही हैं, जबकि दूसरी बहन आशा JBT करने के बाद प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटी हैं।
खुद मोनिका भी पढ़ाई जारी रखे हुए हैं। छोटी बहन सिमरन ITI शमशी में इलेक्ट्रिशियन का कोर्स कर रही हैं> जबकि सबसे छोटी बहन पलक ने हाल ही में बारहवीं की परीक्षा दी है। परिवार का इकलौता भाई ऋषिराज अभी दसवीं कक्षा में पढ़ रहा है।
मोनिका बताती हैं कि उनके पिता ने उन्हें शुरुआत में सिर्फ पकौड़े बनाना सिखाया था, लेकिन जलेबी बनाना उन्होंने खुद सीखा। हम पापा को ध्यान से देखते थे और धीरे-धीरे जलेबी बनाना भी सीख गए। आज स्थिति यह है कि दुकान का हर सदस्य किसी भी काम में पीछे नहीं है।
यह परिवार कई वर्षों से हिमाचल के अलग-अलग मेलों में दुकान लगाता आ रहा है। करीब दो महीने तक चलने वाले इन मेलों में ही उनकी सालभर की आमदनी का बड़ा हिस्सा जुड़ा होता है।
दिनभर मेहनत करने के बाद जब शाम तक सारी मिठाई बिक जाती है, तो पूरा परिवार राहत की सांस लेता है। रात को यही परिवार अपने टेंट में एक साथ सो जाता है और अगले दिन फिर उसी जोश के साथ काम में जुट जाता है।
आज के समय में, जब समाज के कई हिस्सों में बेटियों को अब भी बोझ समझा जाता है। यह परिवार बिना शोर किए उस सोच को चुनौती दे रहा है। यहां बेटियां सिर्फ जिम्मेदारी नहीं निभा रहीं, बल्कि पूरे कारोबार की रीढ़ बन चुकी हैं।