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March 21, 2026

हिमाचल: बेटी ने दिया मां की अर्थी को कांधा, सिर पर सफेद कपड़ा पहन चिता को दी मुखाग्नि

मोक्षधाम में एक बेटी ने निभाए बेटे के फर्ज

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nahan News

नाहन। हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिला में शुक्रवार को एक ऐसा दृश्य सामने आया जिसने समाज की जड़ जमाई मान्यताओं को झकझोर कर रख दिया। जहां वर्षों से अंतिम संस्कार की परंपराएं बेटों तक सीमित मानी जाती रही हैं, वहीं इस बार नाहन शहर के मोक्षधाम में एक बेटी ने सिर पर सफेद कपड़ा बांध कर अपनी मां की चिता को मुखाग्नि दी। बेटी ने आगे बढ़कर न केवल यह जिम्मेदारी निभाई, बल्कि सोच बदलने का मजबूत संदेश भी दिया।

भावनाओं और साहस का संगम

नाहन मेडिकल कॉलेज में मेडिसिन विभाग की सहायक प्रोफेसर डॉ. अनिकेता ने अपनी 75 वर्षीय मां को अंतिम विदाई दी। यह विदाई सामान्य नहीं थी, उन्होंने अपनी मां की अर्थी को कंधा दिया और पूरे विधि-विधान के साथ मुखाग्नि भी दी। सफेद कपड़े में सिर ढके, नम आंखों के साथ लेकिन दृढ़ चेहरे के भाव, यह पल वहां मौजूद हर व्यक्ति के लिए भावुक कर देने वाला था। यह सिर्फ एक अंतिम संस्कार नहीं था, बल्कि परंपरा और बदलाव के बीच एक नया संतुलन भी था।

 

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मां-बेटी के रिश्ते की मिसाल

डॉ. अनिकेता और उनकी मां के बीच गहरा भावनात्मक जुड़ाव था। उनकी मां, जो एक सरकारी स्कूल की सेवानिवृत्त प्रिंसिपल थीं, लंबे समय से बीमार थीं। बीते दो वर्षों में डॉ. अनिकेता ने दोहरी जिम्मेदारी निभाई—दिन में अस्पताल में मरीजों की सेवा और रात में अपनी मां की देखभाल। कई बार हालात ऐसे बने कि उन्हें अस्पताल में ही अपनी मां के साथ रातें बितानी पड़ीं। यह समर्पण केवल कर्तव्य नहीं, बल्कि रिश्ते की गहराई को दर्शाता है।

 

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परंपरा से आगे बढ़ता समाज

अंतिम संस्कार के दौरान उनकी बेटियां और बहन भी साथ मौजूद थीं, जो इस बदलाव की गवाह बनीं। यह दृश्य इस बात का प्रतीक था कि अब परंपराएं केवल लिंग के आधार पर तय नहीं होंगी, बल्कि जिम्मेदारी और भावनाओं के आधार पर निभाई जाएंगी।

नई पीढ़ी के लिए संदेश

दो बेटियों की मां होने के नाते डॉ. अनिकेता का यह कदम और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। उन्होंने समाज को यह स्पष्ट संदेश दिया कि बेटियां हर भूमिका निभाने में सक्षम हैं—चाहे वह परिवार की देखभाल हो या जीवन के सबसे कठिन क्षणों में निर्णय लेना। उनका मानना है कि माता-पिता के लिए सबसे अहम बात यह नहीं होती कि संतान बेटा है या बेटी, बल्कि यह होती है कि वह अपने कर्तव्यों और रिश्तों को कितनी ईमानदारी से निभाती है।

 

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सोच में बदलाव की शुरुआत

नाहन के इस मोक्षधाम में हुआ यह अंतिम संस्कार अब सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि एक सामाजिक बदलाव की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। यह एक ऐसा उदाहरण है, जो आने वाले समय में कई परिवारों को पुरानी सोच से बाहर निकलने की प्रेरणा देगा।

 

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