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October 4, 2025
हिमाचल के इस राजगुरु ने खोजी थी मणिमहेश झील, जानते थे सोना बनाने का फॉर्मूला
मणिमहेश यात्रा में सबके आगे रहती है छड़ी
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चंबा। हिमाचल प्रदेश पूरे देश में एक ऐसा राज्य है जिसकी अपनी अलग ही खासियत है। बात हिमाचल की खूबसूरत वादियों की हो या फिर बड़े-बड़े पहाड़ों की। कलाकृति की हो या फिर रीति-रिवाजों की। हिमाचल ने पूरे विश्व में अपनी अलग पहचान बनाई है।
आज के अपने इस लेख में हम आपको हिमाचल के एक ऐसे जिले के बारे में बताएंगे- जहां के राजगुरु को सोना बनाने का फार्मूला पता था। इतना ही नहीं यही वो तपस्वी थे- जिन्होंने मणिमहेश झील का भी पता लगाया था और इन्होंने ही राजस्थान के राजा से चंबा राजपरिवार को भेंट में मिली शिव पिंडी को मणिमहेश कैलाश के साथ लगती झील के किनारे प्रतिष्ठापित किया था।
हम बात कर रहे हैं चौरासी सिद्धों में से एक गुरु चरपट नाथ जी की- जो बाबा गोरखनाथ के शिष्य थे और उनके पास एक ऐसी विद्या थी जिससे वो साधारण धातु को स्वर्णभस्म में बदल सकते थे।
उनके लिखे एक श्लोक में पारद यानी पारे की महिमा का जिक्र मिलता है और उसी में सोना बनाने की विधि भी समझाई गई है- जिसके कारण उन्हें रसेश्वरसिद्ध कहा गया। बताया जाता है कि नाथ सिद्ध चरपट नाथ 84 सिद्धों के साथ भरमौर पहुंचे थे, जहां उन्होंने निःसंतान राजा साहिल वर्मन को 10 पुत्रों और एक पुत्री का आशीर्वाद दिया।
ऐसे में चंबा राजपरिवार ने उन्हें राजगुरु का दर्जा दिया और उनकी वाणी आज भी "नाथ सिद्धों की बानियां" में दर्ज है-जहां वे पाखंड को तोड़ने, लोभ-मोह से दूर रहने और कामिनी-कंचन यानी धन-स्त्री के पीछे भागने से बचने की सीख देते हैं।
आप खुद सोचिये जिनके पास सोना बनाने का ज्ञान था, वही लोगों को सोने के मोह से दूर रहने की राह दिखाते थे। वहीं, भरमौर का चौरासी मंदिर परिसर-जहां राजा साहिल वर्मन ने 84 सिद्धों की याद में मंदिरों का निर्माण कराया था-उसी में चरपट नाथ को भी शामिल किया गया।
यही नहीं, चंबा के लक्ष्मीनारायण मंदिर समूह के बीचोंबीच उनकी समाधि बनी हुई है। बाकी मणिमहेश यात्रा की शुरुआत भी गुरु चरपट नाथ जी ने ही की थी। इसलिए आज भी जब ये पावन तीर्थ यात्रा निकलती है, तो चरपट नाथ जी की छड़ी सबसे आगे रहती है।
इतिहासकारों का मानना है कि वे 11वीं-12वीं शताब्दी में हुए और नागार्जुन जैसे विद्वानों के समय में जिए। यहां तक कि तिब्बती ग्रंथों में भी उनका जिक्र मिलता है, जिससे साफ होता है कि उनका प्रभाव सिर्फ चंबा तक सीमित नहीं था। यही सारी वजहें हैं जो चंबा की मिट्टी में आज भी उन रसेश्वरसिद्ध की गूंज सुनाई देती है और उनकी कथाएं शैव, योग, तंत्र और बौद्ध परंपराओं का समन्वय दर्शाती हैं।