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November 21, 2025

हिमाचल में बूढ़ी दिवाली की धूम- देवगुरुओं ने अंगारों पर किया नृत्य, दिया आशीर्वाद

आध्यात्मिक ऊर्जा और लोक संस्कृति के अनोखे रंगों से भर उठा

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Mamleshwar Mahadev Dev Guru

मंडी। हिमाचल की प्राचीन देव संस्कृति, लोक परंपराओं और सामूहिक आस्था का अद्भुत मेल करसोग उपमंडल के ममेल गांव में उस समय देखने को मिला जब ऐतिहासिक ममलेश्वर महादेव मंदिर परिसर में बूढ़ी दीवाली का पावन पर्व पारंपरिक उत्साह और शुद्ध वैदिक रीतियों के साथ सम्पन्न हुआ।

देव परंपराओं का अद्भुत मेल

रात जैसे-जैसे गहराती गई, मंदिर परिसर आध्यात्मिक ऊर्जा और लोक संस्कृति के अनोखे रंगों से भर उठा। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह पर्व मार्गशीर्ष अमावस्या की रात मनाया जाता है और मुख्य दीपावली से लगभग एक माह बाद आता है।

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हजारों श्रद्धालुओं की मौजूदगी

बुधवार देर रात मंदिर परिसर में हजारों श्रद्धालु एकत्र हुए। महिलाओं ने लोकगीतों की तान छेड़ी, पुरुषों ने नृत्य की ताल मिलाई और दूर-दूर से आए लोग इस पवित्र अनुष्ठान के दिव्य क्षणों के इंतजार में डटे रहे।

रात भर जागरण जैसा माहौल

मंदिर पुजारी अरविंद और स्नातकोत्तर नीतू भारद्वाज के अनुसार बूढ़ी दीवाली की परंपरा वैदिक युग से चली आ रही है और आज भी उतनी ही आस्था के साथ निभाई जा रही है। इस पर्व का पहला निमंत्रण परंपरा के अनुरूप इस वर्ष भी देव अलैड़ी/डैढ़ी को दिया गया था।

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किसके आगमन से शुरू हुआ मुख्य अनुष्ठान

पर्व का मुख्य चरण तब प्रारंभ हुआ जब बुधवार रात देव-खुंबलियों का मंदिर में आगमन हुआ। सबसे पहले हलयाड/अलैड मंदिर से आई खुंबली पहुंची। कारदार धोल-नगाड़ों और शहनाई की धुन के साथ चलते आए। ग्रामीणों की टोलियां लोकनृत्य करती हुई मंदिर परिसर में दाखिल हुईं।

हाथों में उठाई थी विशाल मशालें

हाथों में उठी विशाल मशालों ने इस प्रवेश यात्रा को अत्यंत भव्य और रहस्यमय बना दिया। इसके बाद दूसरी खुंबली काणी मंदलाह से पहुंची। बुजुर्गों के अनुसार, प्राचीन समय में जोगठी/जगणी मशालें ही यात्रा मार्ग का मार्गदर्शन करती थीं, और वही परंपरा आज तक जीवित है।

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प्राचीन मान्यता भी जीवित

स्थानीय लोक मान्यता कहती है कि नाग कजौणी से जुड़े कीमती आभूषणों का निर्माण और संरक्षण कभी काणी मंदलाह में होता था। इन आभूषणों को देव यात्रा के दौरान आज भी विशेष किलटे (पवित्र डिब्बों) में सुरक्षित रखकर ममेल पहुंचाया जाता है। यह परंपरा क्षेत्र की देव संस्कृति की गहराई और प्राचीनता को दर्शाती है।

देवशक्तियों का मिलन और अंगारों पर नृत्य

रात्रि के सबसे पवित्र क्षण तब सामने आए जब मंदिर के पीछे सड़क पर देव अलैड़ी और नाग कजौणी की देवशक्तियों का मिलन हुआ। यह दृश्य लोगों के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है और इसे देखने के लिए श्रद्धालु देर रात तक इंतजार करते हैं। देवशक्तियों के मिलन के तुरंत बाद ममलेश्वर मंदिर परिसर में वह अलौकिक दृश्य साकार हुआ जिसका सभी को इंतजार था-

देवगुरु ने दहकते अंगारों पर नृत्य किया।

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धधकती आग के ऊपर बिना किसी भय के किए गए इस अनुष्ठान को श्रद्धालु दैवी शक्ति और आस्था की चरम अभिव्यक्ति मानते हैं। वातावरण मंत्रोच्चार, शंखनाद और ढोल-नगाड़ों की धुनों से गूंज उठा।

श्रद्धालुओं का आस्था से भरा सैलाब

दूरदराज के गांवों से आए लोगों ने इन क्षणों को अपनी आंखों में भर लेने के लिए देर रात तक मंदिर परिसर में डेरा डाले रखा। कई श्रद्धालुओं ने बताया कि बूढ़ी दीवाली का यह आयोजन उनके लिए केवल त्योहार नहीं, बल्कि देव संस्कृति से जुड़ाव और अपने अस्तित्व की पहचान है।

 

कुल मिलाकर, ममेल में आयोजित बूढ़ी दीवाली का यह पर्व हिमाचल की जीवंत देव परंपराओं, सामूहिक उत्सव संस्कृति और पीढ़ियों से चले आ रहे आध्यात्मिक अनुष्ठानों का ऐसा संगम था जो हजारों लोगों को एक साथ जोड़ गया और देवभूमि की सांस्कृतिक धरोहर को एक बार फिर जगमगा गया।

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