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August 4, 2026
हिमाचल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला : बुढ़ापे में सेवा नहीं की तो लौटानी पड़ेगी जमीन...
प्रॉपर्टी लेकर बुजुर्ग दंपति की देखभाल करना की बंद
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शिमला। बुजुर्ग दंपति की देखभाल को लेकर हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कर दिया है कि अगर किसी व्यक्ति ने इस शर्त पर अपनी संपत्ति गिफ्ट की है कि प्राप्तकर्ता उसकी वृद्धावस्था में सेवा और भरण-पोषण करेगा- तो उस शर्त का उल्लंघन होने पर गिफ्ट डीड रद्द की जा सकती है। अदालत ने यह भी कहा कि सिर्फ पैसे भेज देना सेवा और देखभाल का विकल्प नहीं माना जा सकता।
न्यायमूर्ति राकेश कैंथला की एकलपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि बुजुर्गों की सेवा केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं हो सकती। मनी ऑर्डर या अन्य माध्यमों से पैसे भेज देना उनकी देखभाल का विकल्प नहीं है। अगर गिफ्ट डीड की मूल शर्त ही सेवा और संरक्षण थी, तो उसका पालन करना अनिवार्य है।
यह मामला शिमला जिले के ठियोग क्षेत्र से जुड़ा है। वर्ष 1997 में शान्तू नामक व्यक्ति ने अपनी आधी कृषि भूमि कांशी राम के नाम गिफ्ट डीड के माध्यम से हस्तांतरित की थी। दस्तावेज में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया था कि कांशी राम और उनका परिवार दाता व उसकी पत्नी की वृद्धावस्था में देखभाल और भरण-पोषण करेगा।
साथ ही यह भी शर्त रखी गई थी कि यदि इस वचन का पालन नहीं हुआ तो गिफ्ट डीड स्वतः निरस्त मानी जाएगी। बाद में दाता ने आरोप लगाया कि संपत्ति अपने नाम करवाने के बाद कांशी राम और उसके परिवार ने उनकी देखभाल बंद कर दी और उनके साथ प्रताड़ना भी शुरू कर दी। इसके बाद उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाते हुए गिफ्ट डीड रद्द करने की मांग की।
मामले की सुनवाई के दौरान प्रतिवादी ने दावा किया कि उसने दाता को मनी ऑर्डर के माध्यम से धनराशि भेजी थी, लेकिन उसे स्वीकार नहीं किया गया। इसी आधार पर जिला अदालत ने पहले ट्रायल कोर्ट का फैसला पलट दिया था।
हालांकि हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड और दस्तावेजों का अध्ययन करने के बाद माना कि गिफ्ट डीड में देखभाल की शर्त स्पष्ट रूप से दर्ज थी। उसके उल्लंघन के पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं। ऐसे में जिला अदालत का फैसला सही नहीं था।
अदालत ने जिला अदालत शिमला के आदेश को निरस्त करते हुए ट्रायल कोर्ट, ठियोग के 12 नवंबर 2002 के फैसले को बहाल कर दिया। इसके साथ ही संबंधित भूमि दाता के कानूनी उत्तराधिकारियों को वापस सौंपने के निर्देश भी दिए।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि संपत्ति के बदले बुजुर्गों की देखभाल का वादा केवल औपचारिक शर्त नहीं, बल्कि कानूनी दायित्व है। यदि कोई व्यक्ति उस दायित्व का पालन नहीं करता, तो उसे संपत्ति पर अधिकार बनाए रखने का हक भी नहीं मिल सकता।