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March 29, 2026

हिमाचल की 20 पंचायतों के 41 गांवों को उजाड़ कर बुझाई जाएगी दिल्ली की प्यास, 7000 लोग होंगे विस्थापित

विस्थापन के मुहाने पर खड़े 346 परिवारों में मुआवजे और पुनर्वास के प्रति गहरा रोष

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Renuka Dam displacement Himachal

सिरमौर। देश की राजधानी दिल्ली की प्यास बुझाने के लिए हिमाचल प्रदेश के सिरमौर में एक बड़ी तैयारी अंतिम दौर में है। गिरी नदी पर बनने जा रही बहुचर्चित श्री रेणुका जी बांध परियोजना अब जमीन पर उतरने को तैयार है। लेकिन इस विकास की कीमत यहां के सैकड़ों परिवार अपने घर-आंगन और पुश्तैनी जमीन खोकर चुका रहे हैं।

 

करीब 50 साल से अटकी यह परियोजना अगले महीने से एक ऐसे चरण में प्रवेश करने वाली है, जहां पहली बार गिरी नदी का रास्ता बदला जाएगा। सुरंगों के जरिए नदी के बहाव को मोड़कर बांध निर्माण का रास्ता साफ किया जाएगा। लेकिन जैसे ही नदी का रुख बदलेगा, वैसे ही इस इलाके की जिंदगी भी हमेशा के लिए बदल जाएगी।

 

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उजड़ने की दहलीज पर खड़े 41 गांव

इस परियोजना के तहत करीब 1500 हेक्टेयर से अधिक जमीन जलमग्न होगी। 20 पंचायतों के 41 गांव इसकी चपेट में आएंगे। लगभग 7000 लोग और 346 परिवार सीधे तौर पर प्रभावित होंगे। जिन खेतों में आज फसलें लहलहा रही हैं, जहां बच्चों की आवाजें गूंजती हैं, कुछ वर्षों बाद वहां सिर्फ पानी का सन्नाटा होगा।

 

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गांवों के लोगों के लिए यह सिर्फ जमीन या मकान खोने का मामला नहीं है, बल्कि उनकी पूरी जीवनशैली, संस्कृति और पहचान दांव पर लगी है। यहां के मंदिर, देवस्थल, श्मशान और पुरखों की यादें सब कुछ इस झील में समा जाने वाले हैं।

घर छोड़ो, लेकिन जाओ कहां?

हाल ही में कुछ परिवारों को 30 दिन के भीतर घर खाली करने के नोटिस मिले हैं। इसके बाद पूरे क्षेत्र में आक्रोश फैल गया है। लोग सवाल कर रहे हैं कि आखिर वे जाएं तो जाएं कहां?

स्थानीय निवासी कहते हैं, “हम बांध के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन हमें उजाड़ने से पहले बसाया तो जाए। सिर्फ घर खाली करने को कहना आसान है, लेकिन नई जिंदगी शुरू करना इतना आसान नहीं।”

 

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मुआवजे पर सबसे ज्यादा नाराजगी

सरकार की ओर से प्रभावित परिवारों को मुआवजे के रूप में लगभग 27 लाख रुपये देने की बात कही गई है। लेकिन लोगों का कहना है कि आज के समय में इस राशि से न तो जमीन खरीदी जा सकती है और न ही नया घर बनाया जा सकता है। विस्थापितों का आरोप है कि उनकी उपजाऊ जमीन के बदले उन्हें बंजर और अनुपयोगी जमीन दिखाई जा रही है। पुनर्वास के लिए चिन्हित स्थानों पर न सड़क है, न पानी, न ही खेती की सुविधा। एक ग्रामीण ने दर्द बयां करते हुए कहा, “हमारी जमीन सोना उगलती है, और बदले में हमें पत्थर दिए जा रहे हैं। वहां न खेती हो सकती है, न जीवन बस सकता है।”

 

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विकास बनाम विस्थापन की बहस

सरकार का दावा है कि यह परियोजना राष्ट्रीय हित में है। इसके जरिए दिल्ली को प्रतिदिन करोड़ों लीटर पानी मिलेगा और हिमाचल को 40 मेगावाट बिजली का लाभ होगा। साथ ही क्षेत्र में सड़क, रोजगार और बुनियादी ढांचे का विकास होगा। लेकिन प्रभावित लोगों के लिए यह विकास एक दर्दनाक सच्चाई बनकर सामने आ रहा है। उनका कहना है कि विकास का लाभ कहीं और जाएगा, जबकि उसकी कीमत उन्हें अपनी जड़ों से कटकर चुकानी पड़ेगी।

राजनीति भी गरमाई

इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। एक ओर जहां इसे बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर राज्य के हितों और प्रभावित लोगों के अधिकारों की बात उठाई जा रही है।

एक नदी, कई सवाल

गिरी नदी, जो सदियों से पहाड़ों के बीच बहती आई है, अब अपने रास्ते से हटाई जाएगी। लेकिन इसके साथ ही कई सवाल भी खड़े हो गए हैं—

  • क्या विकास के नाम पर लोगों को यूं ही उजाड़ा जा सकता है?
  • क्या मुआवजा उनकी जिंदगी की भरपाई कर सकता है?
  • और क्या जिनकी जमीन डूबेगी, उन्हें न्याय मिल पाएगा?

अगले महीने से शुरू होने वाला यह काम सिर्फ एक परियोजना की शुरुआत नहीं, बल्कि सैकड़ों परिवारों के जीवन में एक बड़े बदलाव का संकेत है—एक ऐसा बदलाव, जिसमें उम्मीद कम और अनिश्चितता ज्यादा नजर आ रही है।

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