शिमला। नवरात्रि के 9 दिन मां दुर्गा के अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है। नवरात्रि का आखिरी दिन मां सिद्धिदात्री को समर्पित होता है। मान्यता है कि मां सिद्धिदात्री अपने भक्तों को सिद्धियां देती हैं और उनकी मनोकामनाएं पूरी करती हैं। इस दिन मां की विधि-विधान से पूजा करने और उन्हें पसंदीदा चीजों का भोग लगाने का खास महत्व माना जाता है। उज्जैन के पंडित आनंद भारद्वाज ने बताया कि 9वें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा कैसे करें और उन्हें कौन-सा भोग लगाना शुभ माना जाता है।
मां की पूजा से मिलती है सफलता और आध्यात्मिक शक्ति
मां सिद्धिदात्री की पूजा करने से आध्यात्मिक शक्ति और काम में सफलता मिलने की मान्यता है। अगर कोई भक्त नवरात्रि के पहले 8 दिनों में पूजा नहीं कर पाया है, तो वह 9वें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा कर सकता है। मान्यता है कि सच्चे मन और श्रद्धा से मां की पूजा करने पर उनकी कृपा मिलती है।
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धार्मिक मान्यता के अनुसार, मां सिद्धिदात्री की कृपा से भगवान शिव को 8 सिद्धियां प्राप्त हुई थीं। इन्हें अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व कहा जाता है।
मां सिद्धिदात्री से जुड़ी है अर्धनारीश्वर की मान्यता
मां सिद्धिदात्री का रूप बहुत दिव्य और तेजस्वी बताया गया है। उनकी चार भुजाएं हैं और वे कमल पर विराजमान रहती हैं। मान्यता है कि मां की कृपा से भगवान शिव को 8 सिद्धियां मिली थीं। इसी से जुड़ी एक मान्यता के अनुसार, देवी का आधा हिस्सा भगवान शिव के शरीर में समा गया था, जिसके बाद शिव का अर्धनारीश्वर रूप बना। मां सिद्धिदात्री की पूजा को ज्ञान, साधना और आध्यात्मिक तरक्की से भी जोड़कर देखा जाता है।
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मां को सफेद फूल और पंचमेवा का भोग लगाएं
पंडित आनंद भारद्वाज के अनुसार, मां सिद्धिदात्री को सफेद रंग पसंद माना जाता है। इसलिए 9वें दिन पूजा के दौरान मां को सफेद फूल चढ़ाए जा सकते हैं। भोग में मिठाई, पंचमेवा और फलों से बनी चीजें चढ़ाना शुभ माना जाता है।
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पूजा के समय मन को शांत रखें और मां का ध्यान करें। मान्यता है कि श्रद्धा से की गई पूजा से जीवन में सकारात्मकता आती है और अपने काम में आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है।
पूजा के समय इन मंत्रों का जाप करें
मां सिद्धिदात्री की पूजा के दौरान इन दोनों मंत्रों का जाप करना शुभ माना जाता है।
- ॐ सिद्धिदात्र्यै नमः।।
- सर्वभूता यदा देवी स्वर्गमुक्ति प्रदायिनी।
- त्वं स्तुता स्तुतये का वा भवन्तु परमोक्तयः।।
